ias success story
गाँव की सुबहें कभी धीमी नहीं होतीं। पूर्वी आकाश में जब पहली किरण चमकती है, तब तक गाँव जाग चुका होता है।
ऐसे ही एक गाँव में, जहाँ हरे-भरे खेतों के बीच कच्ची सड़कें मुँह फाड़े खड़ी रहती थीं, वहाँ रामपुर नामक छोटे से गाँव में संदीप का जन्म हुआ था।
उसके पिता रामस्वरूप एक साधारण किसान थे। उनके पास दो बीघे जमीन थी, जिसमें वे गेहूँ और धान की खेती करते थे।
संदीप की माँ सरस्वती देवी एक गृहिणी थीं, जो अपने परिवार की सेवा में ही अपना सारा समय बिता देती थीं।
संदीप जब मात्र पाँच वर्ष का था, तब उसके जीवन पर एक ऐसा ग्रहण लगा जो उसे जीवनभर याद रहा। उसके पिता की असामयिक मृत्यु हो गई।
यह कोई लंबी बीमारी नहीं थी, बल्कि एक हृदयाघात था जिसने उस छोटे से घर को तहस-नहस कर दिया।
उस दिन की यादें संदीप के मन में आज भी ताज़ा हैं—अचानक से घर में मचा कोहराम, माँ का रोना, पड़ोसियों की भीड़, और फिर वो सफेद कपड़े में लिपटा शव।
पिता की मृत्यु के बाद घर की सारी जिम्मेदारी सरस्वती देवी पर आ गई। दो बीघे की जमीन से जो कुछ मिलता था, वो घर चलाने के लिए काफी नहीं था।
गाँव के सरपंच और रिश्तेदारों ने सलाह दी कि लड़के को पालने के लिए कुछ करना होगा। सरस्वती देवी ने फैसला किया कि वे दूसरों के घरों में काम करेंगी।
गाँव में रहने वाले ठाकुर जी के यहाँ उनकी नौकरी लग गई। सुबह चार बजे उठकर वे ठाकुर के बड़े आंगन में झाड़ू लगातीं, फिर बर्तन मांजतीं, और दिन भर घर के अन्य कामों में लगी रहतीं।
शाम को जब वे थकी-हारी लौटतीं, तो छोटा संदीप उनकी गोद में सिर रखकर सो रहा होता।
माँ अपने बेटे के माथे पर चूमती और रोती, फिर खुद को संभालकर कहती, “बेटा, तू पढ़ेगा। तू बड़ा आदमी बनेगा। तेरे बापू का सपना था कि तू पढ़-लिखकर नौकरी करे।”
संदीप बचपन से ही समझदार था। वह जानता था कि उसकी माँ कितनी कठिनाइयों में है।
जब दूसरे बच्चे खेलने जाते, तब वह घर पर बैठकर अक्षर लिखना सीखता। उसके पास एक पुरानी स्लेट थी जो उसके पिता उसके लिए लाए थे। उस पर वह दिन-रात लिखता रहता।
संदीप की उम्र सात साल हुई तो सरस्वती देवी ने उसे गाँव के प्राथमिक स्कूल में दाखिला दिलाया। यह एक साधारण सरकारी स्कूल था जहाँ दो शिक्षक थे और बच्चे खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ते थे।
लेकिन संदीप के लिए यह जन्नत थी। वह पहली बार किताबें देखकर इतना खुश हुआ जैसे कोई खजाना मिल गया हो।
उसके कपड़े पुराने और मुड़े हुए थे, जूते नहीं थे, लेकिन उसकी आँखों में पढ़ने की ललक थी। शिक्षक श्रीनिवास तिवारी जी ने जब पहली बार संदीप को अक्षर लिखते देखा, तो वे हैरान रह गए।
इतना साफ़ और सुंदर लेखन कम ही बच्चों में देखने को मिलता था। शिक्षक जी ने उसे प्रोत्साहित किया और कहा, “लड़के, तुम बहुत आगे जाओगे।”
संदीप स्कूल में हमेशा प्रथम आता था। जब दूसरे बच्चे खेल-कूद में व्यस्त रहते, वह क्लास के बाद भी शिक्षक जी के पास बैठकर और जानकारी लेता।
शाम को घर लौटकर वह माँ के काम में हाथ बँटाता। आंगन में झाड़ू लगाना, बर्तन धोना, और फिर रात को माँ के साथ बैठकर कमरे में बने छोटे से चूल्हे पर रोटी बनाना—यही उसकी दिनचर्या थी।
कक्षा पाँच में था जब संदीप ने पहली बार अपनी माँ को रोते हुए देखा। वह रात को एक कोने में बैठी थीं और अपने पति की तस्वीर को देख रही थीं।
संदीप ने पूछा, “माँ, क्या हुआ?”
सरस्वती देवी ने उसे गोद में बिठाया और कहा, “कुछ नहीं बेटा, बस याद आ रही थी तुम्हारे पिता की। वे कहते थे कि मेरा बेटा Collector बनेगा।”
संदीप ने उसी दिन ठान ली थी कि वह अपने पिता का सपना पूरा करेगा।
जैसे-जैसे संदीप बड़ा होता गया, घर की जरूरतें भी बढ़ती गईं। कक्षा आठ में पहुँचते-पहुँचते वह समझ गया था कि माँ के लिए यह सब कितना मुश्किल है।
एक दिन स्कूल से लौटते समय उसने देखा कि माँ ठाकुर जी के घर से निकल रही थीं और उनके हाथ में कुछ पुराने कपड़े थे।
ठाकुर जी की पत्नी ने उन्हें दिए थे। संदीप की आँखों में आँसू आ गए। उसने सोचा कि अब वह भी कुछ करेगा।
लेकिन सरस्वती देवी ने कड़ा विरोध किया। “तू पढ़ाई पर ध्यान दे। मैंने तुझे इसलिए पाला है कि तू यहाँ से निकले। गाँव के लड़के जैसे खेतों में हल न चलाए, बल्कि दफ्तरों में बैठे।” संदीप ने माँ की बात मान ली, लेकिन मन में एक संकल्प और मजबूत हो गया।
कक्षा दसवीं की परीक्षा में संदीप ने पूरे जिले में टॉप किया। उसके नाम की चर्चा पूरे गाँव में होने लगी। स्कूल के प्रधानाचार्य ने उसे सम्मानित किया।
उसे पाँच सौ रुपये की छात्रवृत्ति मिली। यह पहली बार था जब संदीप के हाथ में इतने पैसे आए थे।
उसने सोचा कि माँ के लिए एक साड़ी खरीदेगा, लेकिन माँ ने मना कर दिया और कहा, “इससे तू किताबें खरीद ले।”
दसवीं पास करने के बाद संदीप के सामने एक बड़ा सवाल था—आगे क्या करें? गाँव में उच्चतर माध्यमिक स्कूल नहीं था। नजदीक का स्कूल चार किलोमीटर दूर था। रोज़ आना-जाना मुश्किल था।
सरस्वती देवी ने सोचा कि लड़के को किसी काम में लगा दें, लेकिन संदीप ने हठ कर लिया कि वह पढ़ेगा।
उसने गाँव के चौराहे पर एक छोटी सी दुकान देखी जो खाली पड़ी थी। यह चौराहा गाँव का मुख्य चौराहा था जहाँ से दो सड़कें निकलती थीं—एक बाजार की ओर और दूसरी शहर की ओर।
यहाँ रोज़ाना सैकड़ों लोग गुजरते थे। संदीप ने सोचा कि यहाँ अंडे की दुकान खोली जा सकती है।
उसने माँ से बात की। सरस्वती देवी ने पहले तो मना किया, लेकिन फिर सोचा कि लड़का पढ़ते-पढ़ते कुछ कमाई भी कर ले तो घर में आसानी होगी।
उन्होंने अपने जेवरात में से एक छोटी सी चांदी की चेन बेची और पाँच सौ रुपये जुटाए। संदीप ने उस पैसे से दुकान का एक महीने का किराया दिया, एक लकड़ी का काउंटर बनवाया, और पचास अंडे खरीदे।
पहले दिन उसने केवल दस अंडे बेचे। लेकिन संदीप ने हार नहीं मानी। वह सुबह चार बजे उठकर अंडे उबालता, मसाला तैयार करता, और छह बजे तक दुकान पर पहुँच जाता।
उसने अपनी दुकान को “संदीप अंडे वाले” नाम दिया। धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि इस लड़के के अंडे बहुत स्वादिष्ट होते हैं। वह हमेशा ताज़े अंडे रखता और ग्राहकों से बड़ी इज्ज़त से बात करता।
संदीप की दिनचर्या बहुत कठिन हो गई थी। सुबह चार बजे उठना, अंडे उबालना, मसाला तैयार करना, फिर दुकान पर बैठना। सुबह सात से नौ बजे तक स्कूल जाना, फिर वापस दुकान पर आना।
दोपहर में जब ग्राहक कम होते थे, तब वह किताबें खोल लेता। शाम को दुकान बंद करके घर जाना, माँ के लिए खाना बनाना, और फिर रात को पढ़ाई करना यही उसकी जिंदगी थी।
कई बार ऐसा होता कि वह पढ़ते-पढ़ते सो जाता। माँ उसे उठाकर बिस्तर पर लिटा देतीं।
लेकिन संदीप की लगन देखकर वह खुद भी प्रेरित होती। वह सोचतीं कि मेरा बेटा कितना मेहनती है।
इंटरमीडिएट की परीक्षा में भी संदीप प्रथम श्रेणी में पास हुआ। उसके नंबर इतने अच्छे थे कि शहर के कॉलेज में उसका एडमिशन हो गया। लेकिन यह एक नई चुनौती थी। कॉलेज शहर में था और गाँव से बीस किलोमीटर दूर था। रोज़ आना-जाना असंभव था।
संदीप ने एक समाधान निकाला। वह सुबह साइकिल से कॉलेज जाता, क्लास लेता, और दोपहर में वापस आकर दुकान संभालता।
शाम को फिर से कॉलेज जाता जब कोई व्याख्यान या प्रैक्टिकल होता। यह सिलसिला तीन साल तक चला।
स्नातक (BA) में प्रवेश लेने के बाद संदीप की जिम्मेदारी और बढ़ गई। अब उसे और गंभीरता से पढ़ना था।
लेकिन दुकान भी उसकी आमदनी का जरिया थी। समय के साथ उसने अपने व्यापार में विविधता लाई। सिर्फ अंडे बेचने के बजाय उसने ब्रेड, बटर और चाय भी रख दी। “संदीप का नाश्ता केंद्र” गाँव के लोगों के लिए मशहूर हो गया।
वह अपनी दुकान पर एक छोटी सी मेज रखता था जहाँ वह ग्राहकों के बीच बैठकर पढ़ाई करता था।
लोगों को आश्चर्य होता कि यह लड़का किताबों में इतना डूबा रहता है। कई लोग उसे उपहास की दृष्टि से देखते, “लो भई, अंडे वाला बन रहा है पंडित।” लेकिन संदीप किसी की परवाह नहीं करता था। उसे पता था कि वह क्या कर रहा है।
उसकी माँ की तबीयत कभी-कभार खराब हो जाती थी। लंबे समय तक काम करने के कारण उनके घुटनों में दर्द रहने लगा था।
संदीप ने एक दिन माँ से कहा, “माँ, अब तुम काम मत करना। मेरी दुकान चल रही है। मैं तुम्हारा ख्याल रख सकता हूँ।” सरस्वती देवी की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने अपने बेटे को कसकर गले लगा लिया।
बीए के पहले वर्ष में संदीप ने अपने गाँव के ही एक प्राइवेट ट्यूटर से अंग्रेजी और राजनीति विज्ञान की कोचिंग ली। वह हर रोज़ दो घंटे पढ़ने जाता।
वहाँ उसे पता चला कि सिविल सेवाओं की परीक्षा क्या होती है। उसके अंदर एक नई जिज्ञासा जागी। उसने पहली बार सुना UPSC शब्द।
बीए के दूसरे वर्ष में एक दिन संदीप ने अखबार में एक लेख पढ़ा कि एक गाँव का लड़का IAS अधिकारी बना है। उसका नाम था—राजेश कुमार। यह पढ़कर संदीप का दिल धड़कने लगा। उसने सोचा कि अगर वह लड़का कर सकता है तो मैं क्यों नहीं?
उस रात उसने अपनी माँ को बताया, “माँ, मैं भी Collector बनूँगा।”
सरस्वती देवी ने पूछा, “बेटा, Collector कैसे बनते हैं?”
संदीप ने बताया, “बहुत मेहनत से, माँ। बहुत पढ़ाई करनी होती है।”
माँ ने हाथ उठाकर उसके सिर पर आशीर्वाद दिया, “जो तेरा मन कहे, वो कर। मैं तेरे साथ हूँ।”
उस दिन से संदीप की जिंदगी बदल गई। उसने अपनी दुकान की टाइमिंग में बदलाव किया। सुबह चार से आठ बजे तक दुकान, फिर कॉलेज, और शाम को चार से छह बजे तक फिर दुकान।
रात को आठ बजे से दो बजे तक पढ़ाई। वह अपने कमरे में एक छोटे से बल्ब की रोशनी में बैठकर किताबें पढ़ता। गर्मियों में पसीना बहता, सर्दियों में ठंड में काँपते हुए हाथों से वह लिखता रहता।
उसने पुरानी किताबों की दुकानों से NCERT की किताबें खरीदीं। इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान—ये विषय उसके पसंदीदा बन गए। वह अखबार पढ़ने लगा। दुकान पर जब भी कोई अखबार लेने आता, वह पहले खुद पढ़ लेता, फिर ग्राहक को देता।
बीए के अंतिम वर्ष में उसने अपनी दुकान का विस्तार किया। अब उसके पास एक छोटा सा फ्रिज भी था जिसमें वह कोल्ड ड्रिंक्स रखता था।
आमदनी अच्छी हो गई थी। उसने अपनी माँ के लिए एक नई साड़ी खरीदी और एक छोटा सा टीवी भी लाया ताकि माँ अकेलेपन में देख सकें।
बीए की परीक्षा में संदीप ने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। उसके नंबर इतने अच्छे थे कि विश्वविद्यालय में उसका नाम आया। उसे स्वर्ण पदक मिला।
यह उसके जीवन का सबसे बड़ा पल था। मंच पर जब प्राचार्य ने उसे मेडल पहनाया, तो संदीप की आँखें नम हो गईं। वह अपनी माँ को याद कर रहा थी जो घर पर बैठी उसकी सफलता के लिए प्रार्थना कर रही होंगी।
लेकिन संदीप के लिए यह सिर्फ एक मुकाम था, मंजिल नहीं। उसने तय कर लिया था कि वह UPSC की तैयारी करेगा।
उसने इलाहाबाद या दिल्ली जाने के बजाय गाँव में ही रहकर तैयारी करने का फैसला किया। उसे पता था कि माँ की देखभाल के लिए उसे यहीं रहना होगा।
उसने अपनी दुकान पर एक छोटा सा “स्टडी कॉर्नर” बनाया। पीछे की दीवार पर उसने भारत का नक्शा लगाया, संविधान की प्रस्तावना चिपकाई, और एक शेड्यूल बनाया। वह रोज़ाना दस-दस घंटे पढ़ाई करता।
दुकान पर जब ग्राहक नहीं होते, वह किताब खोल लेता। रात को दुकान बंद करके घर जाकर फिर पढ़ाई।
उसने पुरानी परीक्षा प्रश्नपत्रों को हल करना शुरू किया। इंटरनेट की सुविधा नहीं थी, इसलिए वह शहर जाकर ऑनलाइन सामग्री प्रिंट करवाता। एक पुराना लैपटॉप उसने सेकंड-हैंड खरीदा था जिस पर वह वीडियो लेक्चर देखता था।
UPSC की प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) की तैयारी एक पहाड़ जैसी लगती थी। दो पेपर—GS और CSAT। संदीप ने अपना सिलेबस बांटा। सुबह सवेरे इतिहास और कला संस्कृति, दोपहर में भूगोल और राजनीति विज्ञान, और शाम को अर्थशास्त्र और विज्ञान।
उसने अपनी दुकान पर एक छोटी सी लाइब्रेरी बना ली थी। किताबें ढेर लग जातीं। ग्राहक आते और देखते कि मालिक किताबों में घुसा रहता है। कुछ लोग तो इसलिए भी आते थे कि इस “पढ़ाकू अंडे वाले” को देख सकें।
तैयारी के दौरान कई मुश्किलें आईं। एक बार माँ बीमार पड़ गईं। उन्हें बुखार हुआ जो कई दिनों तक ठीक नहीं हुआ।
संदीप को दुकान और घर दोनों संभालने पड़े। वह दिन में दुकान, शाम को माँ की सेवा, और रात को जब माँ सो जातीं तब पढ़ाई। वह कई रातों को नहीं सोता था, बस पढ़ता रहता।
उसने कुछ दोस्त बनाए जो शहर से आते थे। वे उसे नए-नए तथ्य बताते, मैगजीन लाते। संदीप ने “योजना” और “कुरुक्षेत्र” जैसी पत्रिकाओं की सदस्यता ली। हर महीने जब ये पत्रिकाएं आतीं, तो वह उन्हें पूरी रात पढ़ता।
जून का महीना था। परीक्षा केंद्र शहर में था। संदीप ने सोचा कि वह सुबह साइकिल से चला जाएगा, लेकिन माँ ने मना कर दिया। “बेटा, एक दिन की दुकान बंद रहेगी तो क्या होगा? तू बस परीक्षा पर ध्यान दे।” संदीप ने पहली बार अपनी दुकान बंद रखी।
परीक्षा भवन के सामने वह खड़ा था। हजारों लड़के-लड़कियाँ थीं, कुछ महंगे कोचिंग से, कुछ अंग्रेजी मीडियम स्कूलों से। संदीप ने साधारण कपड़े पहने थे। उसके हाथ में एक पुराना बैग था जिसमें एडमिट कार्ड और पेन थे।
पहला पेपर हुआ—सामान्य अध्ययन। संदीप ने सवालों को पढ़ा और मुस्कुराया। अधिकांश सवाल उसने पढ़े थे। उसने धैर्य से हर सवाल का जवाब दिया। दूसरा पेपर—CSAT। यह थोड़ा कठिन था, लेकिन संदीप ने हिम्मत नहीं हारी।
परीक्षा के बाद वह घर लौटा। माँ ने दरवाजे पर ही उसका इंतजार किया था।
“कैसा रहा?” माँ ने पूछा।
संदीप ने कहा, “माँ, भगवान भरोसे है। जो होगा अच्छा होगा।”
अगस्त में रिजल्ट आया। संदीप अपनी दुकान पर बैठा था जब उसके दोस्त ने दौड़कर आकर बताया, “संदीप, तेरा नाम आ गया! तू प्रीलिम्स पास कर गया!” संदीप के हाथ काँपने लगे।
उसने अपना पुराना फोन निकाला और वेबसाइट खोली। वहाँ उसका रोल नंबर था। वह प्रीलिम्स पास कर गया था।
उसने तुरंत दुकान बंद की और घर दौड़ा। माँ आंगन में बैठी सब्जी काट रही थीं।
संदीप ने उनके पैर छुए और रोते हुए बोला, “माँ, पहला पहाड़ पार हो गया।” माँ समझ नहीं पाईं।
जब उन्हें पता चला कि उनका बेटा मुख्य परीक्षा के लिए चुना गया है, तो वे फूट-फूट कर रोने लगीं। वे भगवान को धन्यवाद देने लगीं।
अब असली लड़ाई शुरू हुई। मुख्य परीक्षा (Mains) में नौ कागजात लिखने होते थे। संदीप को पता था कि यह उसकी जिंदगी का सबसे कठिन समय है।
उसने अपनी दुकान का समय और कम कर दिया। सुबह छह से आठ बजे तक दुकान, फिर दस घंटे की पढ़ाई।
उसने एक “लेखन अभ्यास” शुरू किया। रोज़ाना वह दस पन्ने लिखता था। उसके पास कोई मार्गदर्शक नहीं था इसलिए वह पुराने टॉपर्स की कॉपी खरीदकर उनकी लेखन शैली सीखता। उसने अपने कमरे की दीवारों पर चार्ट्स लगाए—एक इतिहास का, एक भूगोल का, एक राजनीति का।
निबंध लेखन उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। हिंदी माध्यम होने के कारण उसे अंग्रेजी के शब्दों का सही अनुवाद खोजना पड़ता। उसने एक डायरी बनाई जिसमें वह अच्छे-अच्छे वाक्य लिखता था।
दिसंबर में परीक्षा थी। संदीप ने पूरे नवंबर महीने दुकान बंद रखी। माँ चिंतित थीं कि घर कैसे चलेगा, लेकिन संदीप ने कुछ पैसे बचा रखे थे।
उसने कहा, “माँ, अगर यह परीक्षा पास हो गई तो सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी।”
परीक्षा के दिन आए। पाँच दिन लगातार परीक्षा। संदीप हर दिन सुबह चार बजे उठता, माँ के हाथ का बना पराठा खाता, और केंद्र पर पहुँच जाता।
वहाँ वह देखता कि लोग कारों से आते हैं, महंगे पेन से लिखते हैं। वह अपना साधारण पेन निकालकर लिखने बैठ जाता।
हर पेपर के बाद वह थका हुआ लौटता, लेकिन माँ का चेहरा देखकर ताज़ा हो जाता। माँ उसके लिए गर्म पानी का बैग लातीं, उसके पैर दबातीं, और कहतीं, “बस हो गया, अब आराम कर।”
मार्च आया, लेकिन रिजल्ट नहीं आया। यह इंतजार का कठिन दौर था। संदीप ने फिर से दुकान खोल ली, लेकिन मन लगता नहीं था।
वह हर दिन UPSC की वेबसाइट देखता। अप्रैल के पहले हफ्ते में एक दिन रिजल्ट आया।
संदीप दुकान पर बैठा था। उसने वेबसाइट खोली और अपना रोल नंबर डाला।
स्क्रीन पर लिखा आया—”क्वालिफाइड फॉर पर्सनैलिटी टेस्ट (इंटरव्यू)”। संदीप चीख पड़ा। वह मुख्य परीक्षा पास कर गया था। अब उसे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था।
गाँव में यह खबर आग की तरह फैल गई। लोग उसकी दुकान पर आने लगे—कुछ बधाई देने, कुछ आशीर्वाद लेने। ठाकुर जी खुद आए और कहा, “संदीप बेटा, तूने हमारे गाँव का नाम रोशन किया।”
लेकिन अब एक नई चुनौती थी—साक्षात्कार। संदीप ने कभी किसी बोर्ड के सामने इंटरव्यू नहीं दिया था। उसे नहीं पता था कि क्या पूछा जाएगा। उसने कुछ ऑनलाइन वीडियो देखे, लेकिन इंटरनेट की स्पीड बहुत धीमी थी।
उसने एक तरकीब निकाली। वह अपने दोस्तों से मॉक इंटरव्यू करवाता। वे उससे सवाल पूछते और वह जवाब देता।
वह अपने कमरे में खड़ा होकर आईने के सामने बोलना सीखता। उसने अपने बारे में एक छोटा सा “स्टोरी” तैयार किया—कि वह कौन है, कहाँ से आया है, क्यों IAS बनना चाहता है।
उसने अपनी DAF (Detailed Application Form) पर हर शब्द याद किया।
उसने अपने गाँव के बारे में, अपने जिले के बारे में, अपनी हॉबीज़ के बारे में सब कुछ तैयार किया।
मार्च के अंत में संदीप को दिल्ली का बुलावा आया। उसका साक्षात्कार 2 अप्रैल को निर्धारित था।
यह पहली बार था जब संदीप दिल्ली जा रहा था। उसने एक साधारण सूट खरीदा जो उसे अच्छा लगा। माँ ने उसे कुछ पैसे दिए जो उन्होंने गहने बेचकर जुटाए थे।
ट्रेन की यात्रा लंबी थी। संदीप खिड़की से बाहर देखता रहा। खेत, नदियाँ, शहर—सब कुछ नया था। वह सोच रहा था कि कल क्या होगा। रात भर वह सो नहीं पाया, बस अपने नोट्स पढ़ता रहा।
दिल्ली पहुँचकर उसने एक साधारण धर्मशाला में ठहरने का इंतजाम किया। UPSC भवन देखकर वह हैरान रह गया—इतना विशाल, इतना भव्य। उसने सोचा था कि वह कभी ऐसी जगह नहीं देख पाएगा।
साक्षात्कार के दिन उसने सुबह जल्दी उठकर नहाया, पूजा की, और माँ का आशीर्वाद याद किया।
वह UPSC भवन पहुँचा। वहाँ सैकड़ों उम्मीदवार थे—कुछ अंग्रेजी में बात कर रहे थे, कुछ महंगे सूट में थे। संदीप ने साधारण काले रंग का सूट पहना था।
उसका नंबर दोपहर बाद का था। वह बाहर बेंच पर बैठा इंतजार कर रहा था।
उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। जब उसका नंबर आया, तो वह अपने कदमों को संभालता हुआ कमरे में गया।
पाँच सदस्यीय बोर्ड था। चेयरमैन ने उससे पूछा, “तो आप अंडे बेचते हैं?”
संदीप ने सम्मान से जवाब दिया, “जी हाँ, लेकिन अब मैं अपनी दुकान चलाते हुए पढ़ाई कर रहा हूँ।”
चेयरमैन ने मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा, तो बताइए, अंडे की दुकान चलाने वाला एक IAS अधिकारी क्यों बनना चाहता है?”
संदीप ने गहरी साँस ली और बोला, “सर, मैंने गरीबी देखी है। मैंने मेहनत देखी है। मैं जानता हूँ कि एक गाँव का आम आदमी क्या-क्या सहता है। मैं चाहता हूँ कि मैं उन लोगों की सेवा करूँ जो दबे हुए हैं, जिनकी आवाज़ नहीं सुनी जाती। मेरी माँ ने मजदूरी करके मुझे पाला। मैं चाहता हूँ कि कोई और माँ रोए नहीं, कोई और बच्चा बेबस न हो।”
बोर्ड के सदस्यों ने उसकी बात ध्यान से सुनी। फिर उससे कृषि, शिक्षा नीति, और जिले के विकास पर सवाल पूछे गए।
संदीप ने हर सवाल का जवाब अपने अनुभव से जोड़कर दिया। वह नहीं जानता था कि उसका इंटरव्यू अच्छा हुआ या नहीं, लेकिन वह संतुष्ट था कि उसने सच बोला।
मई का महीना था। पूरा देश गर्मी से तप रहा था। संदीप अपनी दुकान पर बैठा था, ग्राहकों को अंडे परोस रहा था।
उसे पता था कि आज रिजल्ट आ सकता है। दोपहर बारह बजे उसके दोस्त ने फोन किया, “संदीप, रिजल्ट आ गया! देख जल्दी!”
संदीप का हाथ काँप रहा था। उसने अपना पुराना फोन निकाला। वेबसाइट खुली। PDF फाइल डाउनलोड हुई। उसने अपना रोल नंबर सर्च किया—”संदीप कुमार, रोल नंबर 0897654, रैंक 342, IAS, Indian Administrative Service।”
संदीप चीख पड़ा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह दुकान से बाहर निकला और गाँव की गलियों में दौड़ने लगा। लोग उसे देखकर हैरान हो रहे थे। वह अपने घर पहुँचा। माँ बाहर बैठी थीं।
“माँ!” उसने चीखकर कहा, “हो गया! माँ, मैं IAS बन गया!”
सरस्वती देवी समझ नहीं पाईं। जब उन्हें पता चला कि उनका बेटा अब एक अधिकारी बन गया है, तो वे अचेत होकर गिर पड़ीं। पड़ोसियों ने पानी छिड़का। जब उन्हें होश आया, तो वे अपने बेटे को गले लगाकर रोने लगीं।
“तेरे पिता की आत्मा को शांति मिली होगी,” माँ रोते हुए बोलीं। “मैंने तुझे इसलिए पाला था। मैंने यही सोचकर मेहनत की थी।”
पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। लोग मिठाइयाँ लेकर आने लगे। ठाकुर जी ने पूरे गाँव में भंडारे का ऐलान किया।
संदीप की दुकान पर लोगों की भीड़ लग गई। सब उसे छूना चाहते थे, उससे आशीर्वाद लेना चाहते थे।
IAS बनने के बाद संदीप को मसूरी के लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (LBSNAA) में प्रशिक्षण के लिए बुलाया गया। यह उसके जीवन का एक नया अध्याय था।
वह पहली बार हवाई जहाज में बैठा। माँ को छोड़कर जाना मुश्किल था, लेकिन माँ ने कहा, “जा बेटा, देश की सेवा कर। मैं ठीक हूँ।”
मसूरी में प्रशिक्षण एक सपने जैसा था। वहाँ देश के कोने-कोने से चुने हुए युवा थे। संदीप ने वहाँ दोस्ती की, नए विचार सीखे। उसे प्रशासन, कानून, नीति-निर्माण—सब कुछ सिखाया गया।
प्रशिक्षण के दौरान उसे अपने गाँव की बहुत याद आती थी। वह सोचता था कि कैसे विकास की योजनाएँ गाँव तक पहुँचती हैं।
वह अपने प्रोफेसरों से पूछता, “सर, अगर एक अधिकारी ईमानदार हो तो कितना बदल सकता है?”
प्रोफेसर कहते, “संदीप, एक ईमानदार अधिकारी पूरे जिले का चेहरा बदल सकता है।”
दो साल का प्रशिक्षण संपन्न हुआ। संदीप को उत्तर प्रदेश कैडर मिला—अपने ही राज्य में।
उसकी पहली पोस्टिंग एक जिले में सहायक जिलाधिकारी (SDM) के पद पर हुई।
जिस दिन संदीप ने अपना कार्यभार संभाला, उसने अपनी माँ को अपने साथ बुला लिया था।
वह नहीं चाहता था कि माँ अब भी उस पुराने घर में अकेली रहें। उसने शहर में एक छोटा सा घर किराए पर लिया।
जब सरस्वती देवी पहली बार अपने बेटे के दफ्तर पहुँचीं, तो उनकी आँखों में आँसू थे। वहाँ लाल बत्ती की गाड़ी थी, सलामी देने वाले पुलिसकर्मी थे, और उनका बेटा कुर्सी पर बैठा हुआ था—वही बेटा जो कभी अंडे बेचता था।
“माँ, बैठो,” संदीप ने कहा।
माँ ने कहा, “नहीं बेटा, मैं तो बस तुझे देखने आई थी। तू Collector बन गया। तेरे पिता का सपना पूरा हो गया।”
संदीप ने अपनी कुर्सी से उठकर माँ के पैर छुए। “यह सब तेरी मेहनत का नतीजा है, माँ। तूने जो मेहनत की, जो मुझे पाला, वही आज यहाँ बैठा है।”
सरस्वती देवी ने अपने बेटे को आशीर्वाद दिया। उस दिन उन्होंने पहली बार अपने बेटे के दफ्तर में खाना खाया।
SDM के पद पर रहते हुए संदीप ने कई बदलाव किए। उसने गाँवों में जाकर लोगों की समस्याएँ सुनीं। उसने सरकारी योजनाओं को पारदर्शी बनाया। जहाँ पहले रिश्वत ली जाती थी, वहाँ अब ऑनलाइन व्यवस्था हो गई।
एक दिन उसे पता चला कि एक गाँव में स्कूल की इमारत जर्जर हो गई है और बच्चे खुले में पढ़ रहे हैं। यह उसी तरह का स्कूल था जहाँ वह पढ़ा था। उसने तुरंत धनराशि जुटाई और नई इमारत बनवाई।
स्कूल के उद्घाटन पर उसने कहा, “मैं भी एक गाँव का लड़का हूँ। मैं जानता हूँ कि शिक्षा क्या है। यह स्कूल उन सभी बच्चों के लिए है जो सपने देखते हैं।”
उसकी कार्यशैली की चर्चा पूरे प्रदेश में होने लगी। वह हमेशा गरीबों के बीच जाता, उनकी समस्याएँ सुनता।
रात को दफ्तर में बैठकर फाइलें देखता। उसने कभी रिश्वत नहीं ली, कभी किसी को अनुचित लाभ नहीं पहुँचाया।
साल बीतते गए। संदीप आगे बढ़ता गया। वह जिलाधिकारी (DM) बना।
उसके जिले का विकास देखते ही बनता था—सड़कें बनीं, स्कूल बने, अस्पताल बने, भ्रष्टाचार खत्म हुआ।
लेकिन जीवन में एक और दुख आया। सरस्वती देवी की तबीयत बिगड़ने लगी। बुढ़ापे की बीमारियाँ थीं।
संदीप ने अपनी माँ का इलाज देश के सबसे अच्छे अस्पतालों में कराया, लेकिन समय से कोई नहीं जीत सकता था।
एक शाम, जब संदीप अपने दफ्तर से लौटा, तो माँ ने उसे बुलाया। वह बिस्तर पर लेटी हुई थीं।
उन्होंने अपने बेटे का हाथ पकड़ा और कहा, “बेटा, मैं जा रही हूँ। लेकिन मैं खुश हूँ। मैंने अपना वादा निभाया। तेरे पिता को मुँह दिखाने लायक बना दिया तुझे।”
संदीप रोते हुए बोला, “माँ, मत जाओ। मैंने अभी कुछ नहीं किया।”
माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “बस एक बात कहूँगी। जब भी कोई फैसला करना, सोचना कि वह गाँव का लड़का क्या कहेगा जो अंडे बेचता था। कभी घमंड मत करना। हमेशा नीचे से ऊपर देखना, ऊपर से नहीं।”
यह कहकर सरस्वती देवी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। वह चली गईं—शांति से, संतुष्टि से।
संदीप ने माँ का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया। पूरे जिले में शोक की लहर थी।
लोगों ने कहा, “माँ चली गईं, लेकिन बेटे ने उनका नाम अमर कर दिया।”
आज संदीप एक वरिष्ठ IAS अधिकारी है। उसने कई जिलों में काम किया है। हर जगह उसने गरीबों के लिए काम किया है। उसने अपनी माँ के नाम से कई स्कूल खोले हैं गाँवों में। उसने अपनी माँ के नाम पर एक ट्रस्ट बनाया है जो गरीब बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाता है।
वह अक्सर अपने गाँव जाता है। वह चौराहे पर खड़ा होकर देखता है जहाँ उसकी छोटी सी दुकान हुआ करती थी। अब वहाँ एक बड़ी दुकान है, लेकिन संदीप के लिए वह जगह पवित्र है।
वह युवाओं से कहता है, “मैंने अपनी जिंदगी में बहुत संघर्ष किया। मैंने अंडे बेचे, मेहनत की, रातों को पढ़ा। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। आप भी मत मानिएगा। सपने देखिए और उन्हें पूरा करने के लिए जी जान से जुट जाइए।”
संदीप की कहानी आज एक प्रेरणा है। हजारों लड़के-लड़कियाँ जो गाँवों में रहकर, मजदूरी करके पढ़ रहे हैं, वे संदीप को देखकर सोचते हैं कि अगर वह कर सकता है तो हम क्यों नहीं।
उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है: “मैं वह लड़का हूँ जो कभी चौराहे पर अंडे बेचता था। आज मैं एक IAS अधिकारी हूँ। लेकिन मैं अपनी जड़ें नहीं भूला। मेरी माँ ने मुझे सिखाया कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। मैंने वही किया और आज मैं यहाँ हूँ।”
संदीप की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह हर उस व्यक्ति की कहानी है जो संघर्ष कर रहा है, जो सोच रहा है कि उसकी स्थितियाँ उसे आगे नहीं बढ़ने देंगी। यह कहानी कहती है कि अगर आपके पास हौसला है, लगन है, और आप कड़ी मेहनत करने को तैयार हैं, तो कोई भी लक्ष्य दूर नहीं।
एक माँ की ममता, एक बेटे का संकल्प, और एक समाज का साथ—यही तीन चीजें हैं जो किसी भी असंभव को संभव बना सकती हैं। संदीप ने अपने गाँव का नाम रोशन किया, अपनी माँ का सपना पूरा किया, और देश की सेवा की।
और आज, जब वह अपने दफ्तर में बैठता है, तो अपनी मेज पर एक छोटा सा अंडा रखता है—याद दिलाने के लिए कि वह कहाँ से आया है। वह अंडा उसे याद दिलाता है कि कोई काम छोटा नहीं होता, कोई सपना बड़ा नहीं होता। बस जरूरत है तो लगन की, मेहनत की, और अपने लक्ष्य पर अडिग रहने की।
संदीप की माँ सरस्वती देवी आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका आशीर्वाद हर उस बच्चे के साथ है जो गरीबी में पैदा होकर भी सपने देखता है। और संदीप—वह अंडे वाला लड़का—आज एक IAS अधिकारी है, जो देश की सेवा कर रहा है, और हर गरीब के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश कर रहा है।
यही है संदीप की कहानी—धरती का वो बेटा जो आसमान छू लिया।
संघर्ष हमेशा सफलता की कुंजी होती है। जो हार नहीं मानता, वही जीतता है।

