aakhir kyon
समय का काम है चलते रहना।
न वह किसी के लिए रुकता है, न किसी का इंतज़ार करता है। शायद इसी वजह से इंसान भी चलते-चलते बहुत कुछ सीख जाता है।
एक गर्म दोपहर की बात है। आसमान में सूरज अपनी पूरी तपिश के साथ चमक रहा था। हवा जैसे कहीं खो गई थी और पेड़-पौधे भी गर्मी से थके हुए लग रहे थे। ऐसे समय में छः साल का छोटा-सा रेहान चुपचाप अपने घर से बाहर निकल पड़ा।
उसके छोटे-छोटे कदम मिट्टी की उस पतली पगडंडी पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। लेकिन उसका मन उस रास्ते पर नहीं था। वह अपने ही ख्यालों में कहीं उलझा हुआ था।
उसके मन में बार-बार सिर्फ एक सवाल घूम रहा था—
“माँ हमेशा अनवर को इतना प्यार क्यों करती हैं?”
अनवर उसका बड़ा भाई था। रेहान को लगता था कि अनवर अब बड़ा हो गया है, उसे माँ की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। फिर भी माँ हमेशा उसी का ज्यादा ख्याल रखती हैं।
उसने अपने छोटे-से दिल में कई शिकायतें जमा कर ली थीं।
उसे याद आया कि कुछ दिन पहले माँ अनवर के लिए नए खिलौने लाई थीं। उसके लिए रंग-बिरंगे कपड़े भी। और मिठाइयाँ भी।
रेहान ने जब उन खिलौनों को हाथ लगाया था, तब माँ ने उसे प्यार से नहीं, बल्कि हल्की डाँट के साथ कहा था,
“रेहान, ये अनवर के लिए है। तुम इसे मत तोड़ देना।”
बस वही बात उसके छोटे दिल में कहीं चुभ गई थी।
चलते-चलते उसकी आँखें भर आईं।
वह धीरे से खुद से बोला,
“क्या माँ को मेरा बिल्कुल भी ख्याल नहीं है?”
पगडंडी लंबी थी। उसके दोनों तरफ सूखी घास और छोटे-छोटे पेड़ थे। लेकिन रेहान की दुनिया उस समय सिर्फ अपने सवालों तक सीमित थी।
वह चलते हुए आसमान को देखता और फिर जमीन को। जैसे अपने छोटे-से दिल में उठ रहे दुःख का जवाब खोज रहा हो।
लेकिन समय की तरह उसके कदम भी चलते रहे।
कुछ दूर जाने के बाद उसे एक छोटा-सा बगीचा दिखाई दिया।
बगीचे में रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। हवा में मिट्टी और फूलों की मिली-जुली खुशबू थी। कुछ बच्चे वहाँ खेल रहे थे। कोई दौड़ रहा था, कोई हँस रहा था, कोई झूले पर बैठा आसमान को छूने की कोशिश कर रहा था।
उन बच्चों को देखकर रेहान कुछ पल के लिए अपने दुःख को भूल गया।
धीरे-धीरे वह भी उनके साथ खेलने लगा।
कभी पकड़म-पकड़ाई,
कभी मिट्टी से घर बनाना,
कभी पेड़ों के पीछे छिप जाना…
खेलते-खेलते उसके चेहरे पर भी मुस्कान लौट आई।
उसे एहसास ही नहीं हुआ कि कब दोपहर धीरे-धीरे शाम में बदलने लगी।
खेलते हुए अचानक उसने एक छोटी लड़की को देखा जो अपने छोटे भाई को गिरने से बचा रही थी। वह खुद खेलना चाहती थी, लेकिन फिर भी अपने भाई का ध्यान रख रही थी।
उसे देखते ही रेहान के मन में कुछ बदला।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि शायद बड़ा होने का मतलब सिर्फ बड़े खिलौने पाना नहीं होता। शायद जिम्मेदारी भी साथ आती है।
उसे अनवर याद आया।
कैसे वह कई बार उसका हाथ पकड़कर सड़क पार करवाता था।
कैसे रात में डर लगने पर उसके पास सो जाता था।
कैसे कई बार अपनी चीज़ें चुपके से उसे दे देता था।
और माँ…
माँ शायद सिर्फ दोनों बच्चों को अलग-अलग तरीके से संभाल रही थी।
रेहान का छोटा-सा मन धीरे-धीरे अपनी शिकायतों से बाहर आने लगा।
कुछ देर बाद उसने तय किया कि अब घर लौटना चाहिए।
जब वह घर पहुँचा, तब शाम ढल चुकी थी। आसमान हल्का नारंगी हो गया था।
घर के बाहर उसकी माँ परेशान होकर उसे ढूँढ रही थी। जैसे ही उनकी नज़र रेहान पर पड़ी, वह जल्दी से उसके पास आईं।
उनकी आँखों में डर और राहत दोनों थे।
उन्होंने उसे गले लगाते हुए कहा,
“रेहान! तुम कहाँ चले गए थे? तुम्हें पता है मैं कितनी परेशान हो गई थी?”
रेहान कुछ पल तक चुप रहा।
फिर धीरे से बोला,
“माँ… मुझे लगता था कि आप सिर्फ अनवर से प्यार करती हैं।”
यह सुनते ही माँ की आँखें भर आईं।
उन्होंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और मुस्कुराकर कहा,
“पगले… तुम दोनों मेरे दिल के हिस्से हो।
बस प्यार जताने का तरीका अलग होता है।”
रेहान चुपचाप उन्हें देखता रहा।
उस दिन पहली बार उसे समझ आया कि हर प्यार एक जैसा दिखाई नहीं देता, लेकिन उसका मतलब हमेशा एक जैसा होता है।
उस रात रेहान अपनी माँ के पास लेटा बहुत देर तक सोचता रहा।
समय सचमुच चलता रहता है।
लेकिन उसके साथ चलते-चलते इंसान समझना भी सीख जाता है।
उस दिन रेहान ने सिर्फ घर का रास्ता नहीं पाया था…
उसने अपनी माँ के प्यार को समझने का रास्ता भी पा लिया था।

