My Silence
ख़ामोशी…
यह सिर्फ एक शब्द नहीं है।
यह एक ऐसी दुनिया है जहाँ कई बार बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कहा जाता है।
एक बार मेरी मुलाकात ख़ामोशी से हुई।
वह किसी इंसान की तरह नहीं थी, लेकिन फिर भी उसका एक चेहरा था। शांत चेहरा… गहरी आँखें… और ऐसा सन्नाटा जैसे सदियों से वह अपने भीतर हजारों कहानियाँ छुपाए बैठी हो।
मैंने उससे पूछा,
“तुम आखिर हो कौन? लोग तुमसे इतना डरते भी हैं और तुम्हें पसंद भी करते हैं।”
वह हल्का सा मुस्कुरायी।
उसकी मुस्कान बहुत धीमी थी, जैसे झील के शांत पानी पर कोई हवा हल्के से गुज़र गई हो।
वह बोली,
“मैं वही हूँ जो इंसान के दिल की असली आवाज़ सुनती हूँ। जब शब्द थक जाते हैं, तब मैं जन्म लेती हूँ।”
मैं उसकी बातें सुनता रहा।
उसने धीरे से कहा,
“जब दो लोग एक-दूसरे को सच्चे दिल से चाहते हैं ना… तब मैं बहुत खूबसूरत हो जाती हूँ। उन्हें हर बात कहने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। बस एक-दूसरे के साथ बैठना, आँखों में देखना, हाथ पकड़ लेना… और सब समझ में आ जाता है।”
इतना कहते ही मेरे सामने जैसे एक दृश्य उभर आया।
एक पहाड़ी जगह… शाम का समय… आसमान पर हल्की लालिमा… और दो लोग एक चट्टान पर चुपचाप बैठे हुए। उनके बीच कोई बातचीत नहीं थी, फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे वे दुनिया की सबसे गहरी बातें कर रहे हों।
हवा धीरे-धीरे बह रही थी।
पेड़ों की पत्तियाँ हिल रही थीं।
और उनकी वह ख़ामोशी किसी गीत से भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी।
मैं मुस्कुराया और बोला,
“अगर तुम्हारा यह रूप इतना सुंदर है, तो लोग तुमसे डरते क्यों हैं?”
यह सुनते ही उसके चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गयी।
उसकी आँखों में अचानक उदासी उतर आई।
वह कुछ देर चुप रही, फिर बोली,
“क्योंकि हर जगह मेरी मौजूदगी अच्छी नहीं होती।”
मैं उसकी बात समझ नहीं पाई।
वह आगे बोली,
“जब किसी रिश्ते में शब्दों की जरूरत हो… जब किसी को सिर्फ एक जवाब चाहिए हो… जब कोई इंसान टूट रहा हो और सामने वाला सिर्फ चुप रहे… तब मैं बहुत खतरनाक बन जाती हूँ।”
उसकी आवाज़ अब पहले से भारी लग रही थी।
अचानक मेरे सामने एक और दृश्य उभरा।
एक कमरा…
बारिश की रात…
एक लड़की रोते हुए किसी अपने से पूछ रही थी,
“क्या अब तुम्हें मेरी परवाह नहीं?”
लेकिन सामने बैठा इंसान सिर्फ चुप था।
उसकी वह चुप्पी कमरे में फैलती जा रही थी।
इतनी गहरी कि वह लड़की धीरे-धीरे अंदर से टूटती जा रही थी।
तब मुझे एहसास हुआ कि कुछ ख़ामोशियाँ सचमुच इंसान को घायल कर देती हैं।
मैंने धीरे से पूछा,
“और रणभूमि वाली ख़ामोशी?”
यह सुनकर उसकी आँखें और गहरी हो गईं।
वह बोली,
“जब युद्ध के मैदान में अचानक सब शांत हो जाए… जब तलवारों की आवाज़ रुक जाए… जब हवा भी डरते हुए बहने लगे… तब मैं सिर्फ सन्नाटा नहीं होती। मैं आने वाले भय का संकेत होती हूँ।”
मुझे ऐसा लगा जैसे किसी वीरान मैदान में खड़ा हूँ।
चारों तरफ धुआँ… टूटी हुई तलवारें… और एक ऐसा सन्नाटा जो आत्मा तक को डरा दे।
मैंने पहली बार महसूस किया कि ख़ामोशी के भी कई चेहरे होते हैं।
कभी वह प्रेम होती है।
कभी दर्द।
कभी सुकून।
तो कभी खौफ।
मैंने उससे पूछा,
“तो फिर इंसान क्या करे? कब बोले और कब चुप रहे?”
वह हल्के से मुस्कुरायी।
इस बार उसकी मुस्कान में अनुभव था, जैसे उसने सदियों से इंसानों को देखा हो।
वह बोली,
“ख़ामोशी तभी खूबसूरत लगती है जब उसके पीछे समझ हो।
और शब्द तभी अच्छे लगते हैं जब उनमें सच्चाई हो।”
फिर उसने मेरी तरफ देखकर कहा,
“हर जगह बोलना जरूरी नहीं होता।
लेकिन हर जगह चुप रहना भी सही नहीं होता।”
मैं उसकी बातों में खो गया।
सचमुच…
इस दुनिया में बहुत से रिश्ते सिर्फ इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि लोग सही समय पर बोल नहीं पाते।
और बहुत सी लड़ाइयाँ सिर्फ इसलिए खत्म हो जाती हैं क्योंकि किसी ने सही समय पर ख़ामोशी चुन ली।
वह धीरे-धीरे जाने लगी।
मैंने पीछे से पूछा,
“क्या लोग कभी तुम्हें पूरी तरह समझ पाएँगे?”
वह रुकी।
बिना मेरी तरफ देखे बोली,
“जिस दिन इंसान दिल की आवाज़ सुनना सीख जाएगा… उस दिन वह मुझे भी समझ जाएगा।”
इतना कहकर वह धुंध की तरह कहीं खो गई।
और मैं देर तक वहीं खड़ा सोचता रहा कि सचमुच…
ख़ामोशी बहुत छोटी चीज़ लगती है,
लेकिन उसके भीतर पूरी ज़िन्दगी छुपी होती है।


