waiting of the old lady
यह घटना उस समय की है जब मैं नवीं क्लास का स्टूडेंट था। सर्दियों का मौसम था। हर तरफ घने कोहरा छाये हुए थे। ठंड से सभी लोग ठिठुरे हुए थे। अब्बा जी का हुक्म था बाज़ार से टूथपेस्ट लाने का। मैं अपनी साइकिल को बाहर निकाला और एक पुराना कपड़ा लेकर उसको साफ करने लगा।
तभी अब्बा जी बाहर आ गए मुझे देखते ही बोले, “बरख़ुरदार! अगर आज आप अपनी साइकिल को साफ नहीं करेंगें तो काम नहीं चलेगा।”
“जा रहा हूँ अब्बा जी।” मैंने कहा और फिर मैं अपनी प्यारी साइकिल को लेकर रोड पर आ गया। ठीक उसी समय, एक पच्चीस – छबीस साल का आदमी एक बूढी औरत को अपने साइकिल के पीछे बैठाये हुए लेकर मुझसे आगे निकला। चूँकि सिर्फ वही मेरे सामने से जा रहा था, इसलिए मुझे उसका और उस बूढ़ी औरत का चेहरा आज तक याद है।
मैं भी उसके पीछे – पीछे जा रहा था। उस आदमी के पीछे – पीछे चलते हुए मैं बाज़ार पहुँच गया। मैं जिस दुकान से अक्सर सामान खरीदता था, वहां रुक गया, लेकिन वह आदमी आगे चला गया।
मैं थोड़ी देर बाद टूथपेस्ट लेकर घर आ गया। और फिर स्कूल जाने की तैयारी करने लगा। मेरा स्कूल मेरे घर से साढ़े चौदह किलोमीटर दूरी पर है। मैं स्कूल की टैक्सी से जाता था। मेरे स्कूल का नाम गोस्वामी तुलसी दास इंटरमीडिएट कॉलेज है जोकि पडरौना शहर में है।
मैं स्कूल ड्रेस पहनकर अपना बैग उठाया और बाहर टैक्सी का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर बाद एक टैक्सी आती हुई नज़र आई। मैंने हाथ दिखा कर उसको रुकने का इशारा किया। टैक्सी रुकने पर मैं उसमें बैठ गया और टैक्सी चल पड़ी। रास्ते में एक जगह बहुत भीड़ इकठ्ठा था उस जगह का नाम है लक्ष्मीपुर। भीड़ रास्ते पर खड़ी थी इसलिए टैक्सी ड्राईवर ने गाड़ी को रोक दिया।
देखने पर पता चला कि ये वही बुढ़िया थी जिसे मैंने कुछ समय पहले उस नौजवान आदमी के साथ देखा था। पूछने पर उसकी कहानी लोग कुछ इस प्रकार से बता रहे थे।
शायद उस बुढ़िया का बेटा उसको लेकर घुमाने जा रहा था। इस जगह पर रुक कर उसने अपनी माँ से शायद यह कहा हो, “माँ, तुम यहाँ किनारे बैठो मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को लता हूँ।”
बुढ़िया ने इशारे से कहा, ठीक है। और उसका बेटा साइकिल घुमा कर चला गया
और अब काफी देर हो गया था, पर वह वापस नहीं आया। बुढ़िया बोल नहीं सकती थी और उसकी उम्र भी काफी थी। लोग ये जानना चाहते थे कि उसका घर कहाँ है, पर कोई नहीं जान सका। कुछ लोगों ने कई सारे गांव के नाम लिए पर हर बार उसने नहीं में सिर हिला दिया।
धीरे – धीरे वहां खड़ी भीड़ ख़त्म हो गयी। हमारी टैक्सी भी चल पड़ी। मैं काफी देर तक यही विचार करता रहा कि न जाने इस ठण्ड में उस बूढी औरत के साथ क्या होगा। स्कूल पहुंचकर मैं ये बात भूल गया।
किन्तु शाम को स्कूल से निकलते हुए अचानक से मुझे सुबह की बात याद आ गई। टैक्सी में बैठकर घर की तरफ चल दिया। रास्ते में फिर मैंने उस बुढ़िया को देखा वो अभी भी वही बैठी हुई थी। उससे थोड़ी दूर पर कुछ लोग पुआल से कोई घर बना रहे थे। टैक्सी बहुत तेज़ी से उस जगह को पार कर लिया। लेकिन मैं सोचने लगा, शायद उसका बेटा वापस नहीं आया। शायद वे लोग उस बूढ़ी औरत के लिए घर बना रहे थे।
घर पहुंचकर मैं बिना खाना खाए अपने साइकिल को लेकर उस तरफ चल दिया जहाँ उस बूढ़ी औरत को देखा था। आधे घंटे बाद मैं वहां पहुँच गया था। मैंने देखा कि वह फुस का घर अब तैयार हो गया था और दो लोग उस बूढ़ी औरत को उस घर में ले जा रहे थे। कई सारे लोग कई तरह की बातें कर रहे थे। जैसे शायद उसका बेटा उससे थक गया हो, इसलिए उसे यहाँ छोड़ गया। जितने लोग थे, उतने तरह के अनुमान लगा रहे थे।
आस-पास के लोग उसे खाना-पानी दे जाते थे। मैं जब स्कूल जाता या आता तो उस बूढ़ी औरत को दरवाज़े के पास बैठे हुए देखता था। ऐसा लगता था जैसे उसे यकीं हो कि उसका बेटा एक दिन उसे लेने आएगा।
समय का काम है चलते रहना। सर्दियाँ बीत गईं, गर्मी का मौसम आया और बरसात, पर बुढ़िया का इंतज़ार ख़त्म नहीं हुआ। वह वहीं दरवाज़े पर बैठी इंतज़ार करती रही। दसवीं क्लास में मैं वहीँ शहर में ही रहने लगा। मैंने अपना सम्पूर्ण ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया। हाँ, कभी-कभी बारिश में नहाने का मन करता था। बारिस का मौसम भी बीत गया।
ठंड का महीना शुरू हुआ। जनवरी का महीना था। कड़ाके की ठंडी पड़ रही थी। स्कूल में छुट्टी हो गई। अब्बा जी का हुक्म हुआ घर आने के लिए तो मैंने टैक्सी ली और चल दिया। कुछ महीनों बाद मैं फिर उस जगह से गुजरा, वह छोटा – सा घर वहीं था, लेकिन वह बूढी औरत नहीं दिखी।
मैं ड्राइवर अंकल से पूछ बैठा, “अरे महेश चाचा, वह जो बुढ़िया यहाँ रहती थी वह दिखाई नहीं दी?”
महेश चाचा ने जवाब दिया, “बबुआ, वह बुढ़िया तो मर गई। सभी लोग मिलकर उसको जला दिए।”
मुझे बड़ा दुःख हुआ। मुझे उसका इंतज़ार याद आ गया जो कभी ख़त्म ही नहीं हुआ। क्या होता अगर उसका बेटा उसे लेने आ जाता। क्या इतना निर्दयी लोग होते हैं।
आज बर्षों बाद, जब कभी भी मैं उस रास्ते से गुजरता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है जैसे आज भी वो बूढी माँ वहीँ बैठकर अपने बेटे का इंतज़ार कर रही हो।
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