That golden-hair girl
लॉस एंजिल्स की वह सुबह अजीब तरह से शांत थी।
सन्डे के दिन शहर जैसे थोड़ी देर के लिए अपनी भागती हुई साँसों को रोक देता है। मेट्रो स्टेशन पर बैठे हुए मैं लोगों को आते–जाते देख रहा था। हर चेहरे पर कहीं पहुँचने की जल्दी थी, हर आँख में कोई अनकही थकान। तभी मेरी नज़र उस लड़की पर पड़ी।
सुनहरे बाल… हल्की नीली आँखें… और चेहरे पर ऐसी मासूमियत, जैसे किसी पहाड़ी झरने के किनारे खिला हुआ सफेद फूल।
न जाने क्यों, उसे देखते ही मुझे लगा जैसे मैं उसे पहले से जानता हूँ।
जैसे वह इस अजनबी शहर का नहीं, मेरी किसी याद का हिस्सा हो।
मैं उसे देखता रहा और अचानक मेरे भीतर मसूरी की एक पुरानी शाम उतर आई।
देवदार के ऊँचे पेड़ों के बीच से छनती हुई सूरज की आख़िरी लाल किरणें… दूर पहाड़ों पर बिखरी धुंध… हवा में मिट्टी और बारिश की मिली-जुली खुशबू… और भट्टा फॉल्स के पास खड़ी एक लड़की, जिसके सुनहरे बाल उन लाल किरणों में चमक रहे थे।
पहाड़ों में एक अजीब बात होती है।
वहाँ इंसान अकेला होकर भी कभी अकेला महसूस नहीं करता।
पेड़, हवाएँ, बादल… सब जैसे आपके अपने हो जाते हैं।
दिल्ली की भीड़ मुझे हमेशा थका देती थी। चिराग दिल्ली की भागती सड़कें, पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ, लोगों का शोर… वहाँ हजारों चेहरों के बीच भी आदमी खुद को तन्हा महसूस करता है। लेकिन पहाड़ों में, उन खामोश पेड़ों के बीच, मुझे हमेशा ऐसा लगता था जैसे कोई मुझे समझता है।
शायद इसलिए मुझे पहाड़ों से प्यार है।
या शायद इसलिए क्योंकि वहाँ मैं खुद को सुन पाता हूँ।
मैं अक्सर ऐसी जगहों पर अपना फोन घर पर छोड़ देता हूँ। सिर्फ कैमरा साथ रखता हूँ, ताकि तस्वीरें ले सकूँ लेकिन उस पल को जीने से दूर न हो जाऊँ।
मेट्रो स्टेशन पर बैठा मैं उसी याद में खो गया था।
फिर अचानक मन में ख्याल आया — क्या ये वही लड़की हो सकती है?
मैं कुछ देर तक खुद से लड़ता रहा। अजनबी लोगों से बात करना मुझे कभी आसान नहीं लगा। लेकिन उस दिन न जाने कहाँ से हिम्मत आ गई।
मैं उसके पास गया और धीरे से बोला,
“हाय… क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”
उसने मेरी तरफ एक हल्की सी नज़र डाली और मुस्कुराकर कहा,
“हाँ, प्लीज।”
मैं उसके बगल में बैठ गया। कुछ सेकंड तक सिर्फ स्टेशन की आवाजें सुनाई देती रहीं। फिर मैंने हिम्मत करके पूछा,
“क्या आप कभी इंडिया गई हैं?”
वह तुरंत मेरी तरफ देखने लगी। उसकी आँखों में हल्का सा सवाल था, जैसे सोच रही हो — ये अजनबी अचानक ऐसा क्यों पूछ रहा है?
मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ।
मैं तुरंत बोला,
“सॉरी… मैं इंडिया से हूँ। मुझे लगा मैंने आपको वहाँ कहीं देखा है। इसलिए पूछ लिया।”
उसका चेहरा थोड़ा नरम पड़ा।
“ओह… ऐसी बात है। हाँ, मैं इंडिया गई हूँ।”
मेरे भीतर जैसे अचानक कोई पुरानी खिड़की खुल गयी।
“क्या आप मसूरी गईं थीं? भट्टा फॉल्स के पास?”
वह कुछ पल सोचती रही, फिर बोली,
“हाँ… मैं वहाँ गई थी।”
उस एक जवाब ने जैसे मेरे भीतर की किसी अधूरी याद को पूरा कर दिया।
दुनिया कितनी बड़ी है… और फिर भी कभी-कभी कुछ लोग दो अलग महाद्वीपों के बीच दोबारा मिल जाते हैं।
मैं उसे देखता रहा। शायद इसलिए नहीं कि वह खूबसूरत थी, बल्कि इसलिए क्योंकि उसके चेहरे में एक अजीब सा अपनापन था। ऐसे चेहरे जिंदगी में बहुत कम मिलते हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि ये इंसान बुरा हो ही नहीं सकता।
हम बातें करने लगे।
इंडिया की… अमेरिका की… पहाड़ों की… अकेलेपन की… खुशियों की…
उसने अचानक कहा,
“हम सब खुश रहना चाहते हैं… और ये चाहना गलत भी नहीं है। लेकिन क्या हम कभी दूसरों को वही खुशी दे पाते हैं जिसकी उम्मीद खुद से करते हैं? हम चाहते हैं हमारे रास्ते में कांटे न हों… लेकिन कई बार दूसरों के रास्तों में हम खुद कांटे बिछा देते हैं।”
उसकी बात सुनकर मैं कुछ देर चुप हो गया।
कुछ लोग किताबों की तरह होते हैं।
आप उनसे पहली बार मिलते हैं, लेकिन उनकी बातें सीधे आपके भीतर उतर जाती हैं।
हमने साथ में वाल्ट डिज्नी कॉन्सर्ट हॉल देखा, फिर द गेट्टी म्यूज़ियम गए। उन तीन घंटों में ऐसा लगा जैसे हम सालों से एक-दूसरे को जानते हों। दो अजनबी, दो अलग देशों से, लेकिन किसी अनजानी डोर से जुड़े हुए।
लंच के बाद शाम धीरे-धीरे उतरने लगी।
स्टेशन के बाहर हवा थोड़ी ठंडी हो गई थी।
उसने मुस्कुराकर अपना नंबर मुझे दिया।
मैंने भी मुस्कुराकर उसे अलविदा कहा।
मैं जानता था कि शायद मैं उसे फिर कभी नहीं देखूँगा।
कुछ दिनों बाद मुझे इंडिया लौटना था। और सच कहूँ, मेरा मन दोबारा अमेरिका आने का कभी नहीं हुआ। शायद इसलिए मैंने उसे कभी कॉल नहीं किया।
लेकिन कुछ लोग जिंदगी से चले जाने के बाद भी यादों में रह जाते हैं।
आज, चौबीस सितम्बर की शाम, ऑफिस से लौटकर जब मैं अपने फ्लैट की खिड़की के पास बैठा था, अचानक उसकी याद फिर से आ गयी।
मैं सोचने लगा — इस दुनिया में कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जिनका कोई नाम नहीं होता।
न दोस्ती।
न मोहब्बत।
न कोई वादा।
फिर भी वे दिल में रह जाते हैं।
शायद इसलिए कि कुछ लोग हमें इंसानियत पर भरोसा दिला जाते हैं।
वे यह एहसास दिलाते हैं कि दुनिया अभी पूरी तरह बुरी नहीं हुई।
हम जिंदगी में हजारों लोगों से मिलते हैं।
सफरों में, शहरों में, भीड़ों में…
लेकिन उनमें से बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो हमारी यादों का स्थायी हिस्सा बन जाते हैं।
और शायद हर इंसान अपनी कहानी में सच्चा होता है।
लोग सिर्फ अपनी-अपनी नजरों से तय करते हैं कि कौन सही है और कौन गलत।
उस रात मैं देर तक खिड़की से बाहर देखता रहा।
लॉस एंजिल्स बहुत दूर छूट चुका था।
मसूरी भी।
लेकिन कुछ चेहरे…
कुछ बातें…
कुछ मुलाकातें…
कभी पीछे नहीं छूटतीं।

