क्या ये इश्क़ था। Kya Ye Ishq Tha

क्या ये इश्क़ था। Kya Ye Ishq Tha

Kya Ye Ishq Tha

सुमन अपने घर के सामने बने लॉन में वाक कर रही थी जब उसकी सहेली आदिशा आई। आते ही उसने सुमन के कंधे पर हाथ रख दिया। और कहने लगी, “सुमन, तुम्हें पता है आज राहुल और सुनील का झगड़ा हुआ।”
“क्या?” सुमन ने पूछा।
“हाँ! आज राहुल ने लंच पार्टी दिया था और वह सुनील को इन्व़ाइट करना भूल गया। लंच पार्टी के बारे में जब सुनील को पता चला तो वह नाराज़ हो गया।”
“हाँ तो ठीक किया सुनील ने। वह राहुल का बेस्ट फ्रेंड है और उसी को उसने इन्व़ाइट नहीं किया।” सुमन ने अपने कंधे उचकाते हुए कहा।

“तुम तो ऐसे न कहो सुमन! राहुल बहुत अच्छा है और सभी के साथ कितना अच्छे से रहता है। अब गलती से भूल गया तो उसे बुरा नहीं मनाना चाहिए।” आदिशा ने कहा।
“अब हम लोग क्या कर सकते हैं। चलो छोड़ो उनकी बातें। तुमने साइंस का असाइनमेंट पूरा कर लिया?” सुमन उसकी बात को नज़रअंदाज़ करते हुए पूछी।
“अरे कहाँ! मैं तो तुमसे यही पूछने आई थी। मेरे तो कुछ पले ही नहीं पड़ रहा है।” आदिशा ने भौहें सिकोड़ते हुए बताया।

“हाँ तो तुम अपने उस समझदार भाई चंदर से पूछ लेती?” सुमन ने दूर पेड़ पर बैठी कोयल को देखते हुए कहा।
“नहीं भाई मुझे उनसे नहीं पिटना है। वह बात – बात पे कहने लगते हैं चलो जाओ मुझे अपने एग्जाम की तैयारी करनी है।” आदिशा ने चंदर के बिगड़ने पर जैसा वह मुंह बनाता था उसी तरह से नक़ल करते हुए कहा।
“अभी कौन-सा एग्जाम?” सुमन ने हैरानी से पूछा क्योंकि अभी कुछ दिन पहले ही वो कोई एग्जाम दे रहा था।

“आरे, इन्टर्नल एग्जाम है भाई साहब का। और क्या तुम नहीं जानती मेरे पढ़ाकू भाई को? वो हमेशा किताबों में ही घुसे रहते हैं, मम्मी और पापा के पढ़ाकू बेटे। मैंने तुम्हें कितनी दफा कहा है की कोई चक्कर चलाओ, और नहीं तो कम से कम अपने प्यार के जाल में फंसाती तो थोड़ा ध्यान पढ़ाई से हटता।” आदिशा ने जवाब देते हुए कहा।

“मुझे नहीं करनी है तुम्हारे पढ़ाकू भाई से प्यार। तुम्हारे भाई को पढ़ने और डांटने के अलावा कुछ नहीं आता है। मैं तुम्हारे भाई की शक्ल तक नहीं देखना चाहती हूं। याद है पिछली दफा हमने उनके बर्थडे पर आइसक्रीम और फिल्म दिखाने की फरमाइश पर कितना बड़ा लेक्चर सुनना पड़ गया था। मैंने उसे दिन कान पकड़ लिया की मजाल जो अब मैं कभी उनसे कुछ कहूं।” सुमन ने जले हुए आवाज में कहा।

“अब ऐसे तो मत कहो मेरे भाई के बारे में। वह थोड़ा पढ़ाकू टाइप हैं न, इसलिए वो ऐसे हैं। बचपन से ही वह एक बेहतरीन इंजीनियर बनना चाहते हैं। और अब वह बी. टेक. फाइनल ईयर में है, इस साल पूरा मार्क्स एड किया जाता है इसलिए कुछ ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। पिछले 3 सालों से वह नंबर वन पोजीशन पर हैं। अगर इस साल भी उन्होंने टॉप किया तो किसी बढ़िया से कंपनी में जॉब मिलेगी और बहुत अच्छा पे भी।” आदिशा ने भाई का पक्ष लेते हुए कहा।

“ठीक है भाई जैसे भी हो तुम्हारे भाई, मुझे क्या मतलब है मेरी बला से। वह जैसे भी रहे। चलो मैं तुम्हें असाइनमेंट दे देती हूं, मैंने पूरा कर लिया है।” सुमन ने कहते हुए घर की तरफ चल दी।

“शुक्रिया मेरी सबसे प्यारी और इकलौती सहेली को। आदिशा ने कहा।
“अब चलो रहने दो, यही सबसे प्यारी सहेली का किताब तुम मीनू को भी दे चुकी हो। मैं तुम्हारी बातों में नहीं आने वाली।” सुमन चलते-चलते बोली।

“कैसी बात करती हो सुमन। सिर्फ तुम मेरी सबसे प्यारी सहेली हो। उसे तो मैं ऐसे ही कह रही थी ताकि अच्छे से ट्रीट ले सकें। तुम्हें तो मैं अपनी भाभी बनाना चाहती हूं।” अभी आदिशा कुछ और बोलती तब तक सुमन की मां मीरा देवी आ गई और वह उनसे खैरियत पूछने लगी, आदिशा “कैसी हैं आंटी?”
“मैं तो ठीक हूं। तुम बताओ और तुम्हारी मम्मी कैसी है?” वह जवाब देते हुए पूछतीं। “मम्मी तो अच्छी हैं आंटी। आप गांव से कब आई।”
“कल ही तो आई हूं और तुम्हारे अंकल वही गांव में रुक गए हैं। तुम बताओ, तुम्हारा भाई चंदर कैसा है?”
“वो तो ठीक हैं आंटी। आप अपने इंटरनल एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं। आदिशा ने जवाब दिया।

“भगवान उसको अच्छे नंबर से पास करें। बड़ा ही नेक बच्चा है।” सुमन की माँ मीरा देवी ने कहा। सुमन उनके कंधे पर खुद को टिकाते हुए कही, “बच्चा मम्मी! वह बच्चा तो किसी तरह नहीं दिखते हैं।” मीरा देवी ने सुमन को परे धकेलते हुए कहा, “चल दूर हट जा सुमन। चंदर के बारे में कुछ नहीं सुनूंगी। चलो जाओ और आदिशा के लिए चाय बना लो।” सुमन किचन में चली गई तो मीरा देवी और आदिशा बात करने लगे।

अभी वह लोग बात कर ही रहे थे कि तभी चंदर आदिशा को बुलाने आ गया। चंदर को देखते ही मीरा देवी बोल उठी, “आओ चंदर, अंदर आ जाओ।”
“नहीं आंटी, मैं अंदर नहीं आऊंगा। मम्मी ने आदिशा को बुलाने भेजा था। वह छोटे अंकल गांव से आए हैं, और मम्मी के सिर में काफी दर्द है, इसलिए भेजा है कि आदिशा घर जाकर चाचा के लिए कुछ चाय वगैरा का इंतजाम करें।” चंदर ने जवाब दिया। तभी आदिशा बोली, “आ रही हूँ थोड़ी देर में। आप चलो।”
“ठीक है आंटी, मैं जा रहा हूँ, ज़रा इसको जल्दी से भागा दीजिए अपने घर से।” चंदर हंसते हुए चला गया।
“देख रही हैं आंटी, इसी तरह से सभी मुझे सता रहे होते हैं। आदिशा दुखी होते हुए बोली।
“तुम छोड़ो चंदर की बातों को। चलो शाबाश पकौड़ा खाओ और चाय पियो।” मीरा देवी ने आदिशा को समझाते हुए कहा। तभी सुमन चाय और पकौड़ा लेते हुए आई थी और पूछने लगी, “क्या हुआ, मां? कौन आया था? क्या चंदर आया था?”
“हां! और कौन आएगा इस समय? चलो, मेरी बेटी, पकौड़े खाओ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे, और चंदर की बातों को भूल जाओ। मीरा देवी ने आदिशा से फिर कहा।
“इसको क्या हुआ, जो आप मना रहीं हैं?” सुमन मुरझाए हुए आदिशा के चेहरे को देखकर पूछा।
“कुछ नहीं हुआ, तुम असाइनमेंट की नोटबुक लाओ, मुझे जल्दी जाना होगा। वो छोटे अंकल गांव से आए हैं ना।” आदिशा एक पकौड़ा दांतों तले दबाते हुए कही।

सुमन असाइनमेंट की नोटबुक लेने चली गई। वो असाइनमेंट की नोटबुक लाई तो आदिशा और मम्मी किसी बातों में बिजी थीं। आदिशा ने चुपचाप नोटबुक ली और घर को चली गई।

सुमन फिर से लॉन में आ गई और टहलने लगी। उसे चंदर की याद आ गई। चंदर वास्तव में बहुत ही मेहनती था। हमेशा पढ़ाई की बात करता रहता था। सुमन को पढ़ना पसंद था, लेकिन उतना नहीं। उसे चंदर बहुत पसंद था। देखने में चंदर बहुत गोरा तो नहीं था लेकिन ठीक था। गेहुआं रंग, दुबला पतला शरीर लेकिन देखने पर वह अच्छा लगता था। उसका बात करने का अंदाज़ बहुत अच्छा लगता था। वह हमेशा सामने वाले को सुनता था, फिर अपनी बात रखता था। यह बात सुमन को बहुत अच्छी लगती थी। सुमन काफी देर तक इन्हीं ख्यालों में गुम थी। जब मम्मी ने आवाज दी, सुमन ने आज डिनर में मेरी मदद नहीं करोगी क्या? आठ बज गया है। जल्दी आ जाओ।

सुमन सुनकर होश में आई और फिर अंदर की तरह भागी। रविंद्र जी इंडियन पुलिस सर्विस में एसीपी के पोस्ट पर कार्यरत थे। उनकी वाइफ मीरा देवी और उनकी इकलौती बेटी सुमन थी। गांव में बाप-दादा की काफी ज़मीनें थीं, और उनकी वाइफ मीरा देवी अक्सर गांव जाया करती थीं। और कोई था नहीं।

इधर सुरेंद्र जी उनके बचपन के दोस्त थे। सुरेंद्र जी इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे और विद्युत विभाग में कार्यरत थे। सुरेंद्र जी का घर थोड़ी दूरी पर था। जब रविंद्र जी के पिताजी शहर में घर बनवा कर रहने आए तो रविंद्र जी 10 साल के थे। और उनकी दोस्ती सुरेंद्र से हो गई दोनों हम उम्र थे। इसलिए साथ-साथ पढ़ाई भी की। और एक अच्छे पड़ोसी का हक भी अदा कर रहे थे। सुरेंद्र जी की वाइफ गीता देवी थी। सुरेंद्र जी के दो बेटे थे। सुबोध, जो कि बड़ा बेटा था, उसने एमबीए करके एक बड़ी कंपनी में जॉब कर रहा था। छोटा बेटा चंदर, जो कि बीटेक फाइनल ईयर में था, और सबसे छोटी बेटी आदिशा थी, जो बीएससी थर्ड ईयर में थी।

उसी के साथ सुमन भी कॉलेज में थी। दोनों में काफी गहरी दोस्ती थी। दोनों साथ में ही कॉलेज आती-जाती थीं। राहुल और सुनील भी उन्हीं की क्लास में थे और इन सब में दोस्ती भी खूब थी। आदिशा राहुल को पसंद करती थी। राहुल बिजनेस फैमिली से बिलॉन्ग करता था। उसके पापा का प्लास्टिक का बिजनेस था। उसके पापा का नाम सेठ शिवदास था। वहीं सुनील एक गरीब परिवार से था और स्कॉलरशिप मिलने की वजह से यहां पर पढ़ पा रहा था। वह राहुल को पढ़ाई में हेल्प कर देता था, इसलिए दोनों में काफी बनती थी। और दोनों में दोस्ती भी थी। राहुल मन ही मन सुमन को पसंद करता था। यह बात सुमन को नहीं मालूम थी। और इधर सुनील भी सुमन को पसंद करता था जबकि आदिशा सुनील को पसंद करती थी।

सुबह का समय था और सुरेंद्र जी के यहां मेहमान आने वाले थे। कुछ दिन पहले ही उनके ऑफिस में काम करने वाले राकेश जी सुबोध को देखे थे। और सुबोध उनकी बेटी रीमा के लिए सुयोग्य लगा था। यह बात उन्होंने सुरेंद्र जी से कहा और आज राकेश जी अपनी फैमिली के साथ आने वाले थे। सुरेंद्र जी दूर से चिल्लाते हुए आए, “अरे चंदर कहां है? मैंने उससे मिठाइयां लाने के लिए कहा था।”

“हां तो मिठाईयां लेने गया तो है।” गीता देवी ने जवाब दिया। “मुझे कोई भी कमी नहीं चाहिए। गेस्ट रूम को बहुत ही बढ़िया से सजा दीजिएगा। राकेश जी बहुत सफाई पसंद है, उन्हें अपना हर काम सलीके से करना पसंद है। प्लीज गीता जी सब कुछ सही से सेट करा दीजिएगा।” सुरेंद्र जी ने कहा।

“सब ठीक हो जाएगा, आप परेशान ना हो।” गीता देवी ने उन्हें इत्मिनान दिया तो सुरेंद्र जी बाजार चले गए उन्हें कुछ जरूरी काम था।

ठीक बारह बजे सभी मेहमान घर पहुंच गए। राकेश जी और उनकी वाइफ मालती देवी जी और साथ में उनकी छोटी बेटी उर्वशी, बेटा रवि और उनकी बहन रीना देवी थी।

मेहमानों का स्वागत बहुत ही पुरजोशी से किया गया। घर की साफ – सफाई देखकर राकेश जी एकदम मोहित हो गए। मालती देवी को भी सुरेंद्र जी और उनके घर वाले अपनी बेटी के सुयोग्य लगे। मेहमानों को सुरेंद्र जी और उनकी पत्नी गीता जी ने रिसीव किए। मेहमानों को गेस्ट रूम में बैठा दिया गया। दोनों लोग भी उनके साथ बैठ गए, बातें होने लगीं।

इसी बीच सुरेंद्र जी ने अपने नौकर बिरजू को बुलाया। बिरजू बहुत पुराना नौकर था। बिरजू तेरह साल का था जब वह यहाँ आया था। बिरजू सुरेंद्र जी के गांव के रहने वाला था। बिरजू का पिता शराबी था। कभी इधर – कभी उधर से पैसे उधार लेकर शराब पीकर नशे में धुत रहता था। धीरे-धीरे गांव वालों ने उसे पैसे उधार देना बंद कर दिया तो उसके पास थोड़े से जमीने थी, उनको बेचकर शराब पीने लगा। एक दिन शराब न मिलने की वजह से उसने बिरजू को बहुत मारा। बिरजू राकेश जी को जानता था, तो शहर आ गया और उनके घर चाकरी करने लगा। अब तो वह यही का होकर रह गया था। कोई पढ़ाई उसने किया नहीं था तो कहीं और नौकरी मिलना मुश्किल था। यहां उसे महीने की दो हज़ार रुपये और रहना-खाना मिल जाते थे। यही उसके लिए बहुत था। उसने घर जाना छोड़ दिया था, अब यही रहता था। उसको यहां रहते हुए पन्द्रह साल हो गया था। उसे भगवान से अपने लिए कोई शिकायत नहीं थी। लेकिन अपने बाप के लिए वह भगवान से बहुत नाराज रहता था।

बिरजू सुरेन्द्र जी के पास आया, सुरेंद्र जी ने बिरजू से कहा, “बिरजू नाश्ते की व्यवस्था करो।”
“जैसा कहिए मलिक, अभी व्यवस्था किए देता हूं।” यह कहकर बिरजू घर के अंदर चला गया।

और सुरेंद्र जी राकेश जी को अपने नौकर बिरजू के बारे में बताने लगे। इधर गीता देवी मालती देवी से उनकी बेटी के बारे में पूछने लगी। घर में काफी चहल-पहल हो गया था। एक शादी का माहौल हो गया था। तभी राकेश जी बोले, “सुरेंद्र जी सुबोध घर पर हो तो उसे बुलाए जरा।”
“हाँ – हाँ क्यों नहीं अभी बुलवाते हैं। अरे बेटी आदिशा, अपने भाई सुबोध को बुलाओ।” सुरेन्द्र जी ने अपनी बेटी आदिशा को आवाज़ लगाते हुए कहा।
“जी, पापा, अभी बुलाकर लाती हूँ।” आदिशा ने जवाब देते हुए सुबोध को बुलाने चली गई।

सुबोध आदिशा को अपने कमरे में देखकर समझ गया कि अब बकरे की खैर नहीं, उसे मिलने जाना ही होगा। आदिशा आते ही बोली, “भईया! पापा आपको गेस्ट रूम में बुला रहे हैं।”
“क्यों? मुझे क्यों बुला रहे हैं?” सुबोध अनजान बनते हुए बोला।
“क्या आपको नहीं पता है? लड़की वाले आपको देखने आये हैं। अब आप ऐसे अनजान मत बनिए। ऐसे आप किसी और को बनाइएगा। मन में तो लड्डू फुट रहे होंगें, सिर्फ रीमा के ख्वाब आ रहे होंगें।” आदिशा ने कहा।
“चलो निकलो कमरे से, थोड़ी देर में आता हूँ।” यह बोलकर सुबोध उसे बाहर भेज दिया।

उसे बाहर भेजकर सोचने लगा, कौन-सी किफ़ायत पहनेगा वह। थोड़ी देर सोचने के बाद उसने नीले कलर की कमीज़ निकाली और बाथरूम में चला गया। फिर कुछ देर बाद वह तैयार होकर नीचे आया।

लड़की के घर वाले यानी राकेश जी और उनकी फैमिली को सुबोध से मिलकर बहुत अच्छा लगा। राकेश जी सुबोध से मिलकर पूछने लगे, “और बेटा फ्यूचर में क्या प्लान कर रहे हो? जॉब करना है या फिर कोई बिजनेस?”
“अंकल जब चंदर बीटेक कर लेता है तो सोच रहा हूं कि हम दोनों मिलकर एक सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू करेंगे। मैं मार्केटिंग डिपार्टमेंट और चंदर सॉफ्टवेयर डिवीजन देखेगा। यही सोच रहा हूं, तब तक मेरा भी अच्छा एक्सपीरियंस हो जाएगा और चंदर की पढ़ाई भी पूरी हो जाएगी।” सुबोध मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
“यह तो काफी अच्छा प्लान है। तुमने बहुत अच्छा सोचा है, बिजनेस तो काफी सही होता है। थोड़ा मेहनत ज्यादा होता है, टाइम का प्रॉब्लम होता है। एक्स्ट्रा टाइम करना पड़ता है शुरू के दिनों में। लेकिन फिर फ्यूचर संभल जाता है।” राकेश जी कुछ सोच भरे मुद्रा में कहे।

दोनों फैमिली ने मिलकर एक साथ लंच किया। बिरजू दौड़ – दौड़ कर खाना सर्व करता रहा। लंच बहुत ही अच्छे मूड में सभी ने किया। खाना और व्यवस्था देखकर राकेश जी और उनकी पत्नी मालती देवी को बहुत अच्छा लगा। मंत्र मुक्त हो गया। दोनों लोग मन में विचार किये कि वह सुबोध से ही अपनी बेटी रीमा का विवाह करेंगे। फिर मिठाइयों और चाय का दौर चला। सभी का मन मोह लिया, सुरेंद्र जी और गीता देवी का व्यवहार और व्यवस्था ने। फिर राकेश जी ने आने वाले संडे को सुरेंद्र जी को सपरिवार अपने घर इनवाइट किये। सुरेंद्र जी और गीता देवी ने उनके इनविटेशन को सहृदय स्वीकार किये। राकेश जी खुशी मन से विदा हुए। उनके जाने के बाद गीता देवी बोली, “फैमिली तो बहुत अच्छी जान पड़ती है, अब लड़की भी अच्छी हो तो बात बन जाए। लड़के की शादी सही उम्र में हो जाएगा तो बहुत अच्छा हो जाएगा। सुरेंद्र जी ने भी उनकी इस बात के लिए हामी भरी। थोड़ी देर बाद गीता देवी किचन समेटने चली गई। किचन काफी बिखरा हुआ था। उन्होंने बिरजू को काम पर लगाया और आदिशा को भी आवाज दिया।

सन्डे का दिन भी आ गया, सुरेंद्र जी, उनकी पत्नी गीता देवी, बेटी आदिशा और चंदर तैयार हुए राकेश जी के यहाँ जाने के लिए। राकेश जी अपने घर पर सभी का स्वागत बहुत बढ़िया से किया। सुरेन्द्र जी के परिवार को उनका घर और सभी का मिलने का तरीका बहुत अच्छा लगा। रीमा तो बहुत ही खुबसूरत थी, सभी को पसंद आई। शादी की बात पक्की हो गयी। दिन तय हो गया। राकेश जी अपनी बेटी की शादी जल्दी करना चाहते थे। सुरेन्द्र जी राजी हो गए और इस तरह से एक महीने के भीतर का डेट फिक्स हो गया। और फिर शादी भी बहुत धूम – धाम से हो गयी।

इधर सुमन अपने मन ही मन में चंदर से प्यार करती थी। कभी उसने चंदर को बताया नहीं। लेकिन उसे चंदर बहुत पसंद था। वह कई बार सोची की चंदर को बता दे पर कभी उसे बता नहीं पाई। कई बार ये भी सोचती की पता नहीं चंदर का क्या जवाब होगा, पता नहीं वह भी उसे प्यार करता होगा या नहीं??

उस दिन सुमन बहुत जल्दी कॉलेज चली गई थी। सुनील रात रानी के पेड़ के नीचे बैठा हुआ कुछ पढ़ रहा था। जब अचानक से उसकी नज़र सुमन पर पड़ी जो क्लासरूम की तरफ जा रही थी। सुनील काफी दिनों से सुमन को अपने मन की बात बताना चाहता था। आज वह सुमन को अकेला देखकर किसी तरह से हिम्मत जुटा पाया। सुमन वैसे कभी अकेली नहीं होती थी, कभी उसकी फ्रेंड आदिशा होती थी या फिर कोई और। ये एक अच्छा मौका था, इसलिए वह सुमन के पीछे चलते हुए आवाज़ दिया।

“सुमन!”
सुमन पीछे मुड़कर देखा तो सुनील आ रहा था। वह रुक गई। सुनील उसके पास पहुंचकर बोला, “आज इतनी जल्दी आ गई हो?”

“हाँ, आज नींद जल्दी खुल गई तो सोचा थोड़ा पढ़ भी लूँ।” सुमन ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया।

सुनील कुछ पल तक चुप रहा। उसके हाथों में पकड़ी किताब हल्की-हल्की कांप रही थी। वह बार-बार कुछ कहने की कोशिश करता, फिर रुक जाता। सुमन ने उसकी बेचैनी भांप ली।

“क्या हुआ सुनील? कुछ कहना है क्या?” उसने पूछा।

“हां… मतलब… एक बात थी।” सुनील की आवाज धीमी हो गई।

सुमन ने गौर से उसकी तरफ देखा। सुबह की हल्की हवा चल रही थी और रात की रानी की खुशबू पूरे कैंपस में फैली हुई थी। सुनील ने हिम्मत जुटाई और बोला—

“सुमन, मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूँ। काफी समय से कहना चाहता था… लेकिन डर लगता था।”

सुमन एकदम शांत हो गई। उसने ऐसी उम्मीद नहीं की थी। कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी छा गई।

“सुनील…” सुमन धीरे से बोली, “तुम बहुत अच्छे हो। सच में। लेकिन मैं… मैं तुम्हें उस नजर से नहीं देखती।”

सुनील की आंखों में एक पल को उदासी उतर आई, लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की।

“कोई बात नहीं। मैं जानता था शायद ऐसा ही होगा। बस दिल में बात थी, इसलिए कह दिया।”

सुमन को उसके लिए बुरा लगा। वह जानती थी कि सुनील दिल का बहुत अच्छा लड़का है।

“उम्मीद है हमारी दोस्ती पर इसका असर नहीं पड़ेगा?” सुमन ने पूछा।

सुनील हल्का-सा हंसा, “नहीं पड़ेगा। दोस्ती इतनी कमजोर नहीं है।”

तभी पीछे से आदिशा की आवाज आई—

“वाह! सुबह-सुबह क्या सीरियस बातें हो रही हैं?”

दोनों चौंककर पीछे देखने लगे। आदिशा मुस्कुराते हुए उनकी तरफ आ रही थी। उसके पीछे राहुल भी था। राहुल की नजर जैसे ही सुमन और सुनील पर पड़ी, उसके चेहरे का रंग हल्का उतर गया।

“कुछ नहीं,” सुमन तुरंत बोली, “बस पढ़ाई की बातें हो रही थीं।”

राहुल ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसके चेहरे की बेचैनी साफ दिख रही थी। वह चुपचाप जाकर बेंच पर बैठ गया। आदिशा सब समझ रही थी, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

उस दिन क्लास में अजीब-सा माहौल रहा। सुनील शांत था, राहुल भी कुछ खोया-खोया लग रहा था, और सुमन खुद उलझनों में थी। उसे बार-बार चंदर का चेहरा याद आ रहा था।

शाम को जब सुमन घर पहुंची तो देखा मीरा देवी और गीता देवी लॉन में बैठकर बातें कर रही थीं। चंदर भी वहीं बैठा था और अपने लैपटॉप में कुछ काम कर रहा था।

सुमन का दिल अचानक तेज धड़कने लगा।

“आओ सुमन,” गीता देवी मुस्कुराते हुए बोलीं, “तुम्हारा ही इंतजार हो रहा था।”

“मेरा?” सुमन हैरानी से बोली।

“हाँ,” मीरा देवी बोलीं, “चंदर को अपने किसी प्रोजेक्ट में मदद चाहिए। तुम इंग्लिश में अच्छी हो न, तो इसकी रिपोर्ट तैयार कर दो।”

सुमन ने चोरी से चंदर की तरफ देखा। चंदर ने पहली बार हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा और बोला—

“अगर तुम्हारे पास समय हो तो…”

सुमन के चेहरे पर अनजानी खुशी आ गई।

“हां… क्यों नहीं।”

उस दिन पहली बार दोनों काफी देर तक साथ बैठे। चंदर अपने प्रोजेक्ट के बारे में समझाता रहा और सुमन ध्यान से सुनती रही। बीच-बीच में दोनों हंस भी पड़ते। सुमन को महसूस हुआ कि चंदर उतना सख्त नहीं था जितना वह समझती थी।

धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं। कभी प्रोजेक्ट के बहाने, कभी किताबों के बहाने। आदिशा तो पहले से ही दोनों को लेकर सपने देख रही थी।

एक दिन आदिशा ने हंसते हुए कहा—

“मुझे तो पहले से पता था कि मेरी भाभी कौन बनने वाली है।”

सुमन शर्मा गई और उसे मारने दौड़ी।

इधर राहुल धीरे-धीरे समझ चुका था कि सुमन के दिल में उसके लिए जगह नहीं है। उसे दुख जरूर हुआ, लेकिन उसने अपने मन को संभाल लिया। वहीं आदिशा और राहुल की दोस्ती भी धीरे-धीरे गहरी होने लगी। सुनील ने भी अपने दिल को पढ़ाई और अपने सपनों में लगा दिया।

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा।

कुछ महीनों बाद चंदर का रिजल्ट आया। उसने पूरे यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। पूरे मोहल्ले में खुशी की लहर दौड़ गई। सुरेंद्र जी की आंखों में गर्व के आंसू थे।

उस रात सभी लोग जश्न मना रहे थे। घर रंग-बिरंगी लाइटों से सजा हुआ था। सुमन छत पर खड़ी आसमान देख रही थी कि तभी पीछे से चंदर की आवाज आई—

“सुमन।”

वह पलटी। चंदर उसके बिल्कुल पास आकर खड़ा हो गया।

“तुमसे एक बात कहनी थी।”

“हम्म?” सुमन की धड़कनें बढ़ गईं।

चंदर कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—

“तुम्हारे साथ रहते-रहते पता ही नहीं चला कि कब तुम्हारी आदत हो गई। शायद… मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूं।”

सुमन की आंखें चमक उठीं। वह हल्का-सा मुस्कुराई।

“शायद?” उसने शरारत से पूछा।

चंदर भी मुस्कुरा दिया।

“नहीं… शायद नहीं। मैं सच में तुमसे प्यार करता हूं।”

सुमन की पलकों ने शर्म से झुकना सीख लिया। वर्षों से उसके दिल में छुपा प्यार आज उसकी आंखों में उतर आया था।

नीचे घर में खुशियों का शोर था… और ऊपर खुले आसमान के नीचे दो दिल पहली बार एक-दूसरे के इतने करीब आ गए थे।

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