ज़िन्दगी तुम कैसी हो?

ज़िन्दगी तुम कैसी हो

एक बार की बात है, मेरी मुलाकात ज़िन्दगी से हुई।
वह किसी पुराने शहर की एक शांत गली में खड़ी थी। शाम का समय था। आसमान पर डूबते सूरज की लालिमा फैली हुई थी और हवा में हल्की ठंडक थी। मैं कुछ देर तक उसे देखता रहा। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, जैसे किसी ने चाँदनी को इंसानी रूप दे दिया हो।

मैं उसके करीब गया और मुस्कुराकर पूछा,
“ज़िन्दगी… तुम कैसी हो?”

वह हल्का सा हँसती है।

और उसकी हँसी ऐसी थी जैसे सूखे पेड़ों पर अचानक बहार आ गई हो। ऐसा लगा जैसे चारों तरफ फूल झर रहे हों, हवाओं में खुशबू घुल गयी हो और दुनिया कुछ पल के लिए बेहद खूबसूरत हो गयी हो।

वह उसी मुस्कुराते हुए अंदाज़ में बोली,
“मैं बहुत खुश हूँ। मेरे पास दोस्त हैं, चाहने वाले लोग हैं, खूबसूरती है, इज्ज़त है, शोहरत है, रुपया-पैसा है। जो भी मैंने चाहा था, लगभग सब कुछ मेरे पास है। मैं बेहद हसीं तकदीर वाली हूँ।”

मैंने उसकी आँखों में चमक देखी।
उस चमक में जीत थी, सुकून था और थोड़ा सा घमंड भी शायद।

मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि ज़िंदगी खुश है।

मैंने मुस्कुराकर कहा,
“यह जानकर खुशी हुई कि तुम वैसी ज़िन्दगी जी रही हो जैसी तुम चाहती थी। जहाँ तुम्हारे पास सब कुछ है और तुम खुश हो।”

उसने मेरी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया। बस हल्के से सिर हिलाया और आगे बढ़ गई।

मैं कुछ देर तक उसे जाते हुए देखता रहा। फिर मैं भी अपने रास्ते चल पड़ा यह सोचते हुए कि शायद मुझे अभी बहुत दूर तक चलना है। बहुत कुछ समझना बाकी है।

समय धीरे-धीरे गुजरता गया।

दिन बदल गए, मौसम बदल गया, शहर बदल गया और लोगों के चेहरे भी बदल गए।

फिर कई सालों बाद एक दिन अचानक मेरी नज़र उसपर फिर पड़ी।

इस बार वह एक भीड़ भरे बाज़ार के किनारे खड़ी थी। लेकिन अब उसके चेहरे की चमक कहीं खो गई थी। आँखों के नीचे थकान थी और होंठों पर एक अजीब सी ख़ामोशी

मैंने दूर से आवाज लगाई,
“अरे ज़िन्दगी… ज़रा रुको तो!”

उसने मेरी तरफ देखा, लेकिन इस बार वह मुस्कुरायी नहीं।
ऐसा लगा जैसे वह मुझसे नहीं, खुद से छिपना चाहती हो।

फिर भी मैं उसके पास चला गया।

मैंने धीरे से पूछा,
“ज़िन्दगी… तुम कैसी हो?”

वह चुप रही।

उसकी ख़ामोशी बहुत कुछ कह रही थी।
मैंने फिर पूछा,

ऐ ज़िन्दगी तू मुस्कुराती क्यों नहीं,
क्यों हैं तेरे लब ख़ामोश और आँखें बोलती नहीं।।

यह सुनते ही उसने अपना चेहरा झुका लिया।

कुछ पल बाद उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।

मैं उसे चुप कराना चाहता था, लेकिन कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता।

काफी देर तक हमारे बीच ख़ामोशी रही।
फिर वह धीरे-धीरे बोली,

“अब मेरे पास कुछ भी नहीं बचा।
न दोस्त…
न खूबसूरती…
न दुआ करने वाले लोग…
न शोहरत…
न रुपया-पैसा…

सब कुछ धीरे-धीरे मुझसे दूर चला गया। मेरी तकदीर ने भी मेरा साथ छोड़ दिया। अब मैं बिल्कुल अकेली हूँ।”

उसकी आवाज कांप रही थी।

मैं उसकी बात सुनता रहा और सोचता रहा कि यही दुनिया का सबसे बड़ा सच है।

जब इंसान के पास सब कुछ होता है, तब उसे लगता है कि यह हमेशा रहेगा।
लेकिन वक्त… वक्त कभी एक जैसा नहीं रहता।

मैं उसे समझाना चाहता था कि यह जो ज़िंदगी है ना, इसमें हर मौसम हमेशा नहीं रहता।

कभी धूप होती है,
कभी बारिश,
कभी बहारें आती हैं,
तो कभी पेड़ सूख जाते हैं।

कुछ पल सुख के होते हैं,
तो कुछ पल दुःख के।

फर्क सिर्फ इतना होता है कि कौन इंसान टूटकर बिखर जाता है और कौन रोते हुए भी मुस्कुराना सीख लेता है।

मैंने उसकी तरफ देखा और धीरे से कहा,

“ज़िन्दगी…
तुम्हे पता है सबसे खूबसूरत लोग कौन होते हैं?”

वह ख़ामोशी से मुझे देखने लगी।

मैं बोला,

“वो लोग जिन्होंने दर्द देखा हो,
अकेलापन महसूस किया हो,
अपनों को खोया हो,
फिर भी दूसरों के लिए दिल में मोहब्बत बचाकर रखी हो।”

उसकी आँखों में हल्की सी नमी के बीच एक छोटी सी मुस्कान उभरी।

बहुत छोटी…
लेकिन सच्ची।

शायद उसे एहसास हो गया था कि खुश रहना सिर्फ सब कुछ पा लेने का नाम नहीं होता।
कभी-कभी अधूरा होकर भी मुस्कुराना ही असली ज़िन्दगी होती है।

उस दिन जब मैं उससे अलग हुआ, तब शाम ढल रही थी।

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

वह धीरे-धीरे भीड़ में कहीं खो रही थी।

लेकिन इस बार उसके कदमों में पहले जैसी बेचैनी नहीं थी।
शायद उसने फिर से जीना सीख लिया था।

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