शब-ए-बारात की रात: क्या पढ़ें और इसकी फज़ीलत
शब-ए-बारात की फज़ीलत (महत्व):
शब-ए-बारात इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार शाबान के महीने की 15वीं रात है। यह रात खासतौर से अल्लाह ताला की रहमत और मगफिरत (क्षमा) प्राप्त करने का एक अज़ीम (महान) अवसर मानी जाती है। मुस्लिम उम्माह (समुदाय) में इसे दरगुज़री और गुनाहों से माफ़ी की रात भी कहा जाता है। इस रात में अल्लाह अपने बंदों की दुआओं को कुबूल फरमाता है और उनको बख्श देता है। लोग इस मुकद्दस (पवित्र) रात का फायदा उठाने के लिए नवाफिल (नफिल नमाज़), तिलावत-ए-कुरान और दुआ में मशगूल रहते हैं।
हदीस की रोशनी में शब-ए-बारात:
इस रात की अहमियत का अंदाज़ा नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इस हदीस से लगाया जा सकता है:
हज़रत मुआज़ बिन जबल (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फरमाया:
“अल्लाह ताला शाबान की पंद्रहवीं रात (शब-ए-बारात) में अपनी मखलूक (सृष्टि) की तरफ खुसूसी तवज्जो फरमाता है और अपनी सारी मखलूक को बख्श देता है, सिवाय मुशरिक (जो अल्लाह के साथ किसी और को शरीक ठहराए) और कीना रखने वाले (जिसके दिल में दूसरों के लिए दुश्मनी या नफरत हो) के।” (सुनन इब्न माजा, हदीस: 1390)
इस हदीस से साफ होता है कि इस रात माफ़ी पाने के लिए अपने दिल को दूसरों के प्रति साफ करना बहुत ज़रूरी है।
शब-ए-बारात की रात क्या पढ़ें?
1. कुरान-ए-करीम की तिलावत:
शब-ए-बारात की रात में सबसे अफज़ल (बेहतर) कार्य कुरान की तिलावत करना है। कुरान की सूरतें पढ़ने से इंसान को कल्बी (दिली) और रूहानी सुकून मिलता है। आप खासतौर से नीचे लिखी सूरतें पढ़ सकते हैं:
- सूरह अल-फातिहा: यह कुरान की पहली सूरह है और इसकी खास अहमियत है।
- सूरह अल-इखलास: यह एक छोटी लेकिन बहुत फज़ीलत वाली सूरह है, जो अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) को बयां करती है।
- सूरह अल-फलक और सूरह अन-नास: ये सूरतें अल्लाह की पनाह और हर तरह के शर (बुराई) से हिफाज़त के लिए पढ़ी जाती हैं।
2. नवाफिल (नफिल नमाज़):
इस रात में नफिल नमाज़ अदा करना बहुत बाइस-ए-सवाब (पुण्य का काम) माना जाता है।
- आप 2 रकात से शुरू कर सकते हैं और अपनी तौफीक (क्षमता) के अनुसार अधिक रकात अदा कर सकते हैं।
- नमाज़ के बाद दुआ करें और अपनी हाजात (ज़रूरतों) के पूरा होने के लिए अल्लाह से प्रार्थना करें।
3. मसनून दुआएं (विशेष दुआएं):
इस रात में कुछ प्रमुख दुआएं और इल्तिजा (निवेदन) हैं, जिन्हें पढ़ना चाहिए:
- अल्लाहुम्मा इन्नी अस-अलुकल जन्नता व अऊज़ुबिका मिनन-नार: इसका अर्थ है, “ऐ अल्लाह, मैं आपसे जन्नत का सवाल करता हूँ और जहन्नम की आग से आपकी पनाह मांगता हूँ।”
- रब्बिग्फिरली: “ऐ मेरे रब, मेरी मगफिरत फरमा / मुझे माफ कर दे।”
4. तौबा और इस्तगफार:
इस रात में अपने गुनाहों के लिए सच्ची तौबा करें और खासतौर पर अपनी और पूरी उम्माह की मगफिरत की गुज़ारिश करें। आप किसी भी ज़बान में, अपने शब्दों में रो-रो कर अल्लाह से दुआ कर सकते हैं।
5. मगरिब (सूर्यास्त) के वक्त का ज़िक्र:
शाम के वक्त जब सूरज गुरूब (अस्त) हो रहा होता है और शब-ए-बारात शुरू होती है, तब ज़िक्र और तिलावत का विशेष महत्व होता है।
- इस समय “सुभान अल्लाह”, “अल्हम्दुलिल्लाह” और “अल्लाहु अकबर” का विर्द (ज़िक्र) करें, इसके बाद अपनी दुआएं प्रस्तुत करें।
6. दुरूद-ओ-सलाम:
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर कसरत से दुरूद शरीफ और सलाम पढ़ें। दुरूद पढ़ने से अल्लाह की रहमतें नाज़िल होती हैं।
इस रात का मक़सद (उद्देश्य):
शब-ए-बारात के दौरान इबादत करने का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत मगफिरत (क्षमा) नहीं है, बल्कि समाज में प्रेम, भाईचारे और हुस्न-ए-अखलाक (अच्छे व्यवहार) को बढ़ाना है। हदीस के मुताबिक भी अल्लाह उन्हें माफ नहीं करता जो दिलों में कीना रखते हैं। इसलिए यह रात हमें हुकूक-उल-इबाद (बंदों के अधिकारों) को अदा करने और अपने रिश्तों के सुधार के लिए भी प्रेरित करती है।
निष्कर्ष:
शब-ए-बारात की रात दुआ, तिलावत और इबादत का एक अज़ीम मौका है। हमें इस रात का सही इस्तेमाल करना चाहिए, अल्लाह से क्षमा मांगते हुए और दूसरों के लिए भी दुआ-ए-मगफिरत करते हुए। सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम अपनी इबादत को खुशू-ओ-खुज़ू (विनम्रता और एकाग्रता) के साथ करें और वास्तविकता में अल्लाह के साथ एक रूहानी ताल्लुक महसूस करें।
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