मैं रास्ता भूल गया हूँ | main rasta bhul gaya hun

main rasta bhul gaya hun

ज़िन्दगी को देखने का उसका और मेरा नज़रिया …………………… !!!

अब तो हर तरफ अंधकार छा गया है, न जाने कौन सा रास्ता मुझे जाना था। काफी देर से यहाँ पर रुका हूँ। अँधेरा बढ़ता जा रहा है, कुछ समझ में नहीं आता, एक तेज़ चलती हुयी गाड़ी पास से निकल गयी, पर मैं उसे रोक नहीं पाया। कितनी रफ़्तार थी उस गाड़ी की, शायद उसे जल्दी कहीं जाना था या हो सकता है समय पर पहुँचने का वादा हो। मैं कहाँ भटक गया? चलो एक बार फिर रास्तों को देखता हूँ। कुछ समझ में नहीं आ रहा है, रास्ते सात दिशाओं में जा रहे हैं, शायद जे ने सीधे जाने के लिए कहा था। अब कुछ – कुछ ध्यान आ रहा था लेकिन बाबू ने तो बाएं जाने के लिए कहा था। अब कौन सा रास्ता जाऊं दोनों तो बिलकुल अलग है, पता नही माँ ने क्या कहा था, शायद सीधे जाने के लिए बोला था।

अब क्या करूँ कुछ समझ में ही नहीं आता है। काश कि कोई यहाँ दिखता तो मैं उससे पूछ लेता। अब क्या करूँ लगभग बारह साल तो चला ही हूँ, पीछे भी नहीं जा सकता, सारे रास्ते तो अब बदल गए होंगें, अभी चार दिन पहले ही कुछ लोग यहीं से जा रहे थे और वो लोग आपस में बात कर रहे थे की सभी सड़के नयी बन गयी हैं।

मैं भी न पागल हूँ, मुझे उस लड़की पर भरोसा नहीं करना चाहिए था। वह उस दिन कितने भरोसे से कह रही थी कि उसको रास्ता पता है। और मैं, वह और उसके घर के लोग थोड़ा-सा दूरी बनाकर चल रहे थे। कभी – कभी वह लड़की कोई बढ़ियां रास्ता देखकर इधर – उधर हो जाती थी लेकिन फिर न जाने क्यों आकर हम लोगों को रास्ता दिखाने लगती। अब मैं जब यहाँ अकेले बैठा सोच रहा हूँ तब मुझे लग रहा है की वह लड़की तो खुद ही भटकी हुयी थी मुझे कहाँ से रास्ता दिखाती। अब मेरे आँखों के सामने सच आ रहा है। पर अब क्या करूँ, पता नहीं कब वह उस पिछले मोड़ पर रुकर दूसरी तरफ भाग गई। मुझे लग तो रहा था की वो रास्ता नहीं दिखाएगी, लेकिन मुझे भी तो रास्ता नहीं पता था। इसलिए मैंने उस पर यकीं कर लिया।

और पता नही क्यों ऐसा लग रहा था की अब उसे पता है कि कहाँ जाना है, क्योंकि पहले भी तो वो खुद ही रास्ता भूल गयी थी क्योंकि उसके पिताजी ने जो रास्ता बताया था उसी रास्ते से वो भटकते हुए तेरह – चौदह साल तो चली थी और बाद में पता चला था की वो सही रस्ते पर नहीं जा रही थी। और ये बात उसे तीन साल चलने के बाद ही जान गई थी, फिर भी चल रही थी।

और जब मैं ये जान गया तब भी मैं उस पर भरोसा कर लिया की अब शायद उसको सही रास्ता पता है, और मुझे भी मेरे घर तक पहुंचा देगी। पर उसे कई बढियां रास्ता दिखा और जब भी उसे साफ सुथरा रास्ता दिखाई देता वो उधर मुड़कर जाने लगती, बाद में जब वह रास्ता थोड़ी दूर जाकर ख़त्म हो जाता या फिर मुश्किल लगता तो फिर वो मुड़कर इधर चली आती।

और मैं भी साथ में भटकने लगता हूँ। अब तो तीन दिन हो गया है जब पिछले मोड़ पर हम लोग थक कर सो गए थे और न जाने कब वह लड़की उठकर किसी और तरफ चली गयी। जब मैं उठा तो चारों तरफ तलाश करने लगा, लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दी। फिर मैं जंगल की तरफ गया, पर वह उधर भी नहीं थी। अब मैं उसे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गया था। फिर वापस आकर घास पर बैठ गया। अपने अँगुलियों से घास नोचने लगा। तभी एक कागज़ उड़ता हुआ मेरे पैर के पास रुका, मैं यूँही उसे देखने लगा।

उस पर लिखा था, तुम अच्छा मुसाफिर नहीं हो, मुझे तुम्हारे साथ चलना अच्छा नहीं लगता है। मैं तुम्हें रास्ता दिखाती हूँ फिर भी मेरा तारीफ़ नहीं करते। पहले के मेरे साथी बहुत अच्छे थे वो सब मेरे नॉलेज का बड़ा तारीफ़ करते थे और कहते थे की मुझे सब आता है। लेकिन तुम कभी नहीं कहते हो। मैं इधर – उधर सुन्दर रास्ते की तरफ जाती हूँ तो तुम मुझे बुरा – भला कहते हो। ये कहते हो की एक ही रास्ते से जाना चाहिए। पर दुनिया में तो लोग अलग-अलग रास्ते देखते हैं, परखते हैं और जो सही लगता है उधर से जाते हैं।

तुम्हारे साथ तो दूसरा रास्ता चेक भी नहीं कर सकते। मुझे तो सभी तरफ देखना अच्छा लगता है। और जो लोग हमारे पीछे – पीछे आ रहे थे वो लोग तो बहुत अच्छे हैं, उन्हें भी घूमना, सही रास्ता देखना, परखना, मज़े करना, हँसना – बोलना, अच्छा लगता है। तुमसे तो लाख गुना अच्छे है। इसलिए मैं अब उनके साथ जाती हूँ। तुम अपने घर का रास्ता खुद ही देख लेना। हालाँकि मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ, लेकिन मैं अब अलग से जाऊँगी। हाँ! अगर तुम चाहो तो कभी रास्ते में मिलना तो मैं तुम्हें रास्ता समझा दूंगी। अभी तुम सो रहे हो, तो नहीं जगाती हूँ। फिर तुम बिगड़ने लगोगे। अच्छा ठीक है, चलती हूँ ….।

मुझे तो बड़ा गुस्सा आया, उस दिन कैसे कह रही थी कि मुझे तो तुम्हारे घर का पता मालूम है, और मुझे रास्ता दिखा देगी। मुझे लग रहा है की वो उस समय अकेला जा रही थी और उसके घर वाले भी थोड़ा दुरी से चल रहे थे इसलिए उसने मेरे साथ चलने की बात की होगी। फिर उसके पास घर वाले आ गए थे और फिर बाकी के लोग। उसने बताया भी था कि पहले वो अकेली नहीं थी, काफी सारे लोग थे उसके साथ। सभी लोग बड़े खुश थे और साथ-साथ जा रहे थे। फिर एक तूफान आया और ये दूसरी तरफ खो गई और बाकी लोग भी अलग हो गए।

एक अजनबी उस तूफान में मिला था—उस अजनबी की माँ, दो भाई और एक बहन। ये सब लोग उस तूफान में मिले और साथ चलने लगे थे। और कुछ दिन बाद उस अजनबी की माँ और बाकी के लोगों से बनना बंद हो गया, यानी झगड़ा हो गया। फिर वो सड़के के दूसरी तरफ से चलने लगे। और ये दूसरी तरफ। लेकिन फिर वो सब दूसरा रास्ता पकड़ लिए तो ये अकेली थी। कुछ – कुछ दुरी पर अलग अलग अजनबी लोग मिलते थे तो कुछ देर का साथ रहता था, लेकिन उन्हें दुसरे रास्ते से जाना था इसलिए ये फिर अकेली हो जाती थी। तभी उस दिन मैं मिला और मुझे भी उसी तरफ जाना था। तो हम लोग साथ चलने लगे। लेकिन फिर वही, उसे मेरा साथ अच्छा नहीं लग रहा था इसलिए उस रात चली गयी।

मैं क्या ही उसे छुट देता, चारो तरफ भेड़ियों का राज है और जंगल में होता ही कौन है। और भेड़िये तो होशियार होते हैं। आप कभी उनको करीब से देखिए, कितने खूबसूरत होते हैं। उनके शरीर पर बिछा हुआ खाल और उसके ऊपर बाल, कितना खूबसूरत बना देते हैं। क्योंकि उन्हें अपना शिकार करना है, इसलिए वो बिल्कुल हमारा ख्याल रखने वाले बन जाते हैं। हमारे साथ चलते हैं। जरूरत पड़ने पर रोते हैं। जब मैं छोटा था तब से उनके रोने की आवाज़ जंगल से आते हुए सुनता हूँ।

इस लड़की को कितना भी समझा दो लेकिन इसे लगता है की भेड़िये अच्छे होते है। वैसे तो मैं भी उतना समझदार नहीं हूँ की जान सकूँ की वो सब सही हैं या गलत लेकिन बर्षों से यही देखता आ रहा हूँ। इसलिए उसे रोका था। उसे खास बनाना चाहता था। पर सभी को ऐसा नहीं होना है। सभी आज़ाद हैं। तो ठीक है, अब मैं पुरानी गलतियों को सही तो नहीं कह सकता। गलत का तारीफ़ नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे कोई फायदा तो चाहिए नहीं। जाना है, जाओ। मैं क्या कर सकता हूँ?

मैं काफी देर तक सीधे तो चलता रहा लेकिन फिर सात रास्ते आ गए, और अब मैं फंस गया हूँ, जाऊं तो जाऊं किधर। और वैसे भी यहाँ कोई दिख भी नहीं रहा है की जिससे पूछूं। ऐसा करता हूँ यहीं पर बोरा बिछाकर कुछ देर बैठता हूँ, और कल सुबह यहीं एक झोपड़ी बना लूँगा और जब कोई मुसाफिर दिखेगा तो उससे पूछकर आगे चलेंगें। अब जबकि मैं इस बाहर के अँधेरे में बैठा हूँ तो मुझे अपने अंदर की रौशनी दिखाई दे रही है।

एक बार मैं, अब्बा जी और माँ बैठकर बातें कर रहे थे, माँ रिश्तों के बारे में बात कर रही थी, उस दिन उन्होंने एक बात जो मुझे बताई थी वो आज भी याद आ रहा है, उन्होंने कहा था की रिश्तों में सगा और सौतेला नहीं होता है बल्कि मुहब्बत और ख़ुलूस होता है। अब जब की मैं दुनिया देखने लगा हूँ और माँ की बताई हुयी उस बात को ढूढता हूँ तो कहीं दिखाई नहीं देती है। ये दुनिया जैसे अपने और पराये के जाल में डूबी हुई है। अपना है तो ठीक है और अगर पराया है तो नहीं।

दूसरा डूब रहा है तो कोई नहीं, और अगर अपना है तो रोना है। दूसरा है तो तमाशा और अपना है तो मातम। क्या खूब है ये दुनिया। इस बाहर के अंधकार में अपने अंदर का वुजूद दिख रहा था। अब जब सोच रहा हूँ तो रोने का मन कर रहा है। ठीक है फिर मैं थोड़ा रो लेता हूँ। इस अंधकार में मुझे रुमाल भी नहीं मिल रहा है, पता नहीं कहाँ रख दिया था। भूख भी बहुत तेज़ लग रही है। अब क्या करूँ? ऐसा करता हूँ कि लेट जाता हूँ और लेटकर तारों को देखता हूँ। हाँ! ये ठीक रहेगा। और शायद फिर नींद भी आ जाए।

अपने जूते को निकालकर सिर की तरफ बोरे के नीचे रख लेता हूँ, तकिया की जरुरत नहीं होगी। फिर मैं लेट कर आसमान को देखने लगा, लेकिन वहां तो गहरा अँधेरा है। कोई तारे नहीं, कोई चाँद नहीं, इतना गहरा अँधेरा आसमान में भी। कभी-कभी झींगुरों की आवाज़ सुनाई दे रही है। और कभी सियारों के रोने की आवाज़। फिर उस लड़की की याद आ गई। अब तक साथ होते तो काफी आगे तक चले गए होते। और मजेदार खाना भी खाने को मिल गया होता। फिर मेरा ध्यान उसके बात पर चला गया, क्या मैं इतना बुरा हूँ की मेरे साथ चलना उसको अच्छा नही लग रहा था।

अरे! मैं तो सिर्फ उसका भला सोच रहा था और थोड़ा सा अपना भी। अगर वो ज्यादा इधर उधर नहीं जाती तो हम लोग अपनी बातें करते हुए, अपने में मगन आराम से सफर पूरा करके घर पहुँच जाते। जब वह रास्ता दिखा रही थी तो मुझे तो बिल्कुल ही इधर-उधर देखने का मन नहीं कर रहा था। हाँ! पता नहीं क्यों ऐसा लगता था की वह मुझे घर तक पहुँचा देगी तो मुझे किसी और से हेल्प लेने की जरुरत नहीं है।

इसीलिए लोग कहते हैं कि किसी एक पर भरोसा नहीं करना चाहिए। लड़कियों पर तो मुझे कभी भरोसा नहीं था, पर न जाने क्यों मैंने इस लड़की पर भरोसा कर लिया। और इसी लिए भरोसा टूटा भी, ठीक ही हुआ मेरे साथ। और करो भरोसा…! मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा है, मन कर रहा है कि अपना गला घोट लू। लेकिन हारना उचित नहीं है। चलो शाबास! सो जाओ, कल सोचेंगे क्या करना है।

अभी तो मेरा बंदा यहीं पर रुक गया है तो आगे नहीं लिखूंगा लेकिन जब वो चलने लगेगा तो फिर लिखता हूँ आप दुबारा चेक कर लीजियेगा ये पोस्ट अगर अच्छा लग रहा हो तो और नहीं लग रहा हो तो गली मत दीजियेगा … आपका साहिल

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